श्रीगंगानगर , जनवरी 25 -- गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार द्वारा घोषित पद्म पुरस्कारों में राजस्थान से तीन हस्तियों को चुना गया है।

राजस्थान की तीन हस्तियों- भपंग वादक गफरूद्दीन मेवाती जोगी, अलगोजा वादक तगाराम भील और समाजसेवी स्वामी ब्रह्मदेव महाराज में स्वामी ब्रह्मदेव की कहानी अलग और प्रेरणादायक है।

चार दशक से अधिक समय से नेत्रहीन और मूक-बधिर बच्चों के जीवन को रोशन करने वाले इस तपस्वी का योगदान, एक ऐसी प्रेरणा है जो सीख देती है कि सच्ची सेवा कैसे की जाती है। श्रीगंगानगर में शिक्षा के क्षेत्र में एक नई अलग जगाने वाले दिवंगत प्रोफेसर से माहेश्वरी के बाद स्वामी ब्रह्मदेव दूसरी हस्ती हैं जिनको पदमश्री सम्मान मिला है।

राजस्थान में एक ऐसा समय ऐसा था जब नेत्रहीन बच्चों के लिए संसाधन नाममात्र के थे और समाज की नजरें उनसे दूर थीं। तभी 13 दिसंबर 1980 को श्रीगंगानगर की धरती पर स्वामी ब्रह्मदेव महाराज ने श्री जगदंबा अंधविद्यालय की नींव रखी। यह कोई साधारण शुरुआत नहीं थी। यह एक दृढ़ संकल्प की कहानी थी, जहां सेवा भावना ने हर बाधा को पार कर लिया। अब यह संस्थान सैकड़ों जरूरतमंद बच्चों के लिए एक मायने रखता है। यहां न केवल निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती है, बल्कि आवासीय छात्रावास के माध्यम से उन्हें एक परिवार जैसा आश्रय भी देता है।

यहां बच्चे न सिर्फ पढ़ते हैं, बल्कि ब्रेल लिपि, संगीत, कला और व्यावसायिक कौशलों से युक्त होकर आत्मनिर्भर बनते हैं। स्वामी जी यहीं नहीं रुकते, संस्थान परिसर में मूक-बधिर बच्चों के लिए एक अलग विद्यालय भी चल रहा है, जहां सांकेतिक भाषा और विशेष प्रशिक्षण के जरिए इन बच्चों को मुख्यधारा में लाया जा रहा है। यह सब कुछ स्वामी ब्रह्मदेव के नेतृत्व में हो रहा है, जो विकलांगता को कभी अभिशाप नहीं बल्कि छिपी प्रतिभा का खजाना मानते हैं।

स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में स्वामी ब्रह्मदेव महाराज की यात्रा उतनी ही प्रेरणादायक है जितनी उनकी शिक्षा सेवाएं। उन्होंने श्री जगदंबा धर्मार्थ नेत्र चिकित्सालय स्थापित करके नेत्र रोगियों के लिए एक जीवन रेखा खींच दी। पिछले 25 वर्षों से चली आ रही निःशुल्क नेत्र जांच शिविरों की श्रृंखला ने हजारों ग्रामीणों और गरीबों की आंखों को बचाया है। ये शिविर केवल जांच तक सीमित नहीं रहते। उपचार, सर्जरी और दवाओं की व्यवस्था भी होती है जो वंचित वर्गों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं। एक किसान, जो आर्थिक तंगी के कारण इलाज न करा पाता या एक मजदूर परिवार का बच्चा, जिसकी आंखें बचने की संभावना हो, -स्वामी ब्रह्मदेव ने इन्हें नई जिंदगी दी है।

इस तपस्वी जीवन की जड़ें स्वामी ब्रह्मदेव महाराज के गुरु संत बाबा करनैल दास महाराज से जुड़ी हैं, जो पंजाब के विवेक आश्रम जलाल से प्रेरणा के स्रोत थे। गुरु की शिक्षाओं ने स्वामी ब्रह्मदेव को सादगी, अनुशासन और करुणा का पाठ पढ़ाया। वह कभी चमक-दमक वाले जीवन की ओर नहीं मुड़े, बल्कि, सादा वस्त्र धारण करके चुपचाप सेवा में लगे रहे।

पद्मश्री की यह घोषणा श्रीगंगानगर के कोने-कोने तक खुशी की लहर ले आई है। स्वामी ब्रह्मदेव का यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि उन सभी के लिए एक संदेश है जो कमजोर वर्गों के लिए संघर्षरत हैं।

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