नयी दिल्ली , अप्रैल 05 -- आज पूरा देश भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री और महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू जगजीवन राम की जयंती मना रहा है। भारतीय राजनीति के इतिहास में 'बाबूजी' के नाम से मशहूर जगजीवन राम एक ऐसे विरले राजनेता थे, जिनका संसदीय करियर दुनिया के किसी भी लोकतंत्र के लिए एक अटूट विश्व रिकॉर्ड है।

वर्ष 1908 में पांच अप्रैल को बिहार के भोजपुर (तत्कालीन शाहाबाद) के चंदवा गांव में जन्मे बाबूजी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तथा कलकता विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान ही स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के साथ-साथ सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी थी।

जगजीवन राम फांउडेशन की वेबसाइट के अनुसार, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रेरित होकर जगजीवन राम ने देश की आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई और 10 दिसंबर 1940 को व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तारी दी। बाद में 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में सक्रिय भागीदारी के कारण 19 अगस्त 1942 को उन्हें फिर से गिरफ्तार किया गया।

जगजीवन बाबू का मानना था कि दलितों को न केवल सामाजिक सुधार बल्कि राजनैतिक प्रतिनिधित्व के लिए भी लड़ना चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अखिल भारतीय रविदास महासभा और ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज लीग की स्थापना की, ताकि वंचित समाज को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा जा सके।

उनकी राजनैतिक सूझबूझ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आजादी से ठीक पहले 1946 में बनी 'अंतरिम सरकार' में उन्हें श्रम मंत्री के रूप में शामिल होने के लिए सम्राट जॉर्ज षष्ठम ने स्वयं आमंत्रित किया था। दो सितंबर 1946 को गठित उस सरकार में वे सबसे युवा मंत्री और दलित समाज के एकमात्र प्रतिनिधि थे।

इससे पहले 1936 में मात्र 28 वर्ष की आयु में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य बने थे और फिर बिहार विधानसभा के लिए निर्विरोध चुने गए थे। 1937 में वे शिक्षा और विकास मंत्रालय में संसदीय सचिव भी नियुक्त हुए थे।

सासाराम संसदीय क्षेत्र के साथ उनका रिश्ता किसी निर्वाचन क्षेत्र जैसा नहीं, बल्कि एक परिवार जैसा था। यही कारण है कि आजादी के बाद उन्होंने 1952 से 1984 तक लगातार आठ बार वहां से जीत दर्ज की। एक कुशल प्रशासक के रूप में बाबूजी ने लगभग 31 वर्षों तक केंद्रीय कैबिनेट के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दीं।

देश के पहले श्रम मंत्री के तौर पर उन्होंने न्यूनतम मजदूरी और कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) जैसे ऐतिहासिक कानून बनाए। संचार मंत्री रहते हुए उन्होंने ही निजी एयरलाइनों का राष्ट्रीयकरण कर 'इंडियन एयरलाइंस' और 'एयर इंडिया' की स्थापना की थी।

भारत को अन्न के संकट से उबारने और 'हरित क्रांति' का मार्ग प्रशस्त करने में भी बाबू जगजीवन राम की केंद्रीय भूमिका रही। 1967 के भीषण सूखे के समय उनके दृढ़ संकल्प का ही नतीजा था कि देश न केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना, बल्कि अनाज का निर्यात भी करने लगा। रक्षा मंत्री के रूप में 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनके शानदार नेतृत्व ने देश को वह ऐतिहासिक विजय दिलाई, जिससे विश्व मानचित्र पर बंगलादेश का उदय हुआ।

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