तिरुवनंतपुरम , फरवरी 03 -- कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केरल विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्निथला ने कहा है कि विवादित स्प्रिंकलर डेटा शेयरिंग सौदे के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ केरल सरकार उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार सख्त कार्रवाई करे।
श्री चेन्निथला ने कहा कि सीपीएम के राज्य सचिव एम. वी. गोविंदन द्वारा माफी की मांग को लेकर दिए गए हालिया बयान, 28 जनवरी 2026 को आए केरल उच्च न्यायालय के फैसले की पूरी तरह गलत व्याख्या पर आधारित हैं। इस फैसले में स्प्रिंकलर सौदे से जुड़ी रिट याचिकाओं का निपटारा किया गया था।
एक बयान में श्री चेन्निथला ने कहा कि यह फैसला कोविड-19 काल के दौरान उनके द्वारा अपनाए गये रुख को पूरी तरह सही ठहराता है, जब उन्होंने जनहित में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए केरल के नागरिकों के संवेदनशील स्वास्थ्य डेटा को एक विदेशी कंपनी को सौंपने का विरोध किया था।
उन्होंने याद दिलाया कि अप्रैल 2020 में उच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश में उनके तर्कों के मूल भाव को स्वीकार किया गया था, जिसके बाद राज्य सरकार को यह सौदा वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। श्री चेन्निथला के अनुसार, अंतिम फैसला उसी अंतरिम आदेश की पुष्टि करता है।
उन्होंने फैसले के उस हिस्से का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने कहा था कि चूंकि यह अनुबंध अल्प अवधि का था, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया और डेटा नष्ट कर दिया गया, इसलिए किसी अतिरिक्त आदेश की आवश्यकता नहीं है। फैसले में स्पष्ट रूप से कहा गया कि 24 अप्रैल 2020 का अंतरिम आदेश "स्थायी रूप से पुष्ट किया जाता है।"श्री चेन्निथला ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अनुबंध के क्रियान्वयन में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां पाई हैं। अदालत ने यह भी माना कि तत्कालीन आईटी प्रधान सचिव एम. शिवशंकर ने न तो मंत्रिमंडल की मंजूरी ली और न ही मुख्यमंत्री की सहमति, जिसे अदालत ने "कर्तव्य में घोर लापरवाही" करार दिया। इससे यह पूरी तरह साबित होता है कि यह समझौता मनमाना और अनियमित था।
पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अदालत ने इस तर्क को भी स्वीकार किया कि यह समझौता अवैध था, विशेषकर इसलिए क्योंकि इसके तहत होम क्वारंटीन में रह रहे व्यक्तियों का निजी डेटा उनकी सहमति के बिना साझा किया गया।
उन्होंने उस अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) क्लॉज पर भी अदालत की चिंता का उल्लेख किया, जिसमें न्यूयॉर्क की अदालतों को विशेष अधिकार दिया गया था। इससे डेटा चोरी या लीक होने की स्थिति में प्रभावित लोगों के लिए कानूनी उपाय लगभग असंभव हो जाते। अदालत ने इस आशंका को भी सही माना कि स्प्रिंकलर इस डेटा का व्यावसायिक उपयोग कर सकती थी।
श्री चेन्निथला ने कहा कि उनकी याचिका पर पारित अंतरिम आदेश के कारण स्प्रिंकलर को एक महीने से भी कम समय तक डेटा रखने की अनुमति मिली, जिसके बाद डेटा को राज्य डेटा केंद्र के तहत सी-डीआईटी को सौंप दिया गया और शेष डेटा अदालत के निर्देशानुसार नष्ट कर दिया गया।
उन्होंने बताया कि उच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा गठित माधवन नांबियार समिति की रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया था कि यह समझौता संविधान और स्थापित नियमों का उल्लंघन कर, कानून और वित्त विभागों से परामर्श किए बिना किया गया। इसी आधार पर अदालत ने माना कि यह समझौता संविधान के अनुच्छेद 299(1) का उल्लंघन है। राज्य सरकार के उस तर्क को भी अदालत ने खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि वित्तीय दायित्व न होने के कारण अनुच्छेद 299 लागू नहीं होता। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह संवैधानिक प्रावधान सभी सरकारी अनुबंधों पर लागू होता है, चाहे उनमें वित्तीय दायित्व हो या नहीं।
फैसले में यह भी दर्ज किया गया कि प्रक्रिया नियमों, केरल सचिवालय मैनुअल और अनिवार्य विभागीय परामर्शों का पालन नहीं किया गया और पूरे तरीके को मनमाना एवं संरचनात्मक रूप से कमजोर बताया गया। अदालत ने राज्य सरकार को संबंधित अधिकारी के खिलाफ उचित कदम उठाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के निर्देश दिए।
श्री चेन्निथला ने कहा कि अदालत प्रभावित व्यक्तियों को मुआवजा देने की उनकी मांग पर केवल इसलिए विचार नहीं कर सकी, क्योंकि सरकार उन लोगों का विवरण प्रस्तुत करने में विफल रही, जिनका डेटा एकत्र किया गया था।
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