नैनीताल , जनवरी 09 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कोटद्वार के चर्चित सुमित पटवाल हत्याकांड में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए विशाल उर्फ जॉली, जोनी शर्मा और दीपक सिंह रावत को बरी करने का आदेश दिये हैं।

न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति आलोक महरा की खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता सबूत पेश करने में विफल रहा है।

यह मामला 22 मार्च 2015 का है जब कोटद्वार में मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने प्रॉपर्टी डीलर सुमित पटवाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में निचली अदालत ने विशाल और जोनी को हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई दी थी जबकि दीपक रावत को धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया गया था। चौथे आरोपी सुरेंद्र सिंह की अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो गई थी।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में मुख्य रूप से सीसीटीवी फुटेज की साख पर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 बी के तहत अनिवार्य प्रमाण पत्र के बिना इलेट्रॉनिक साक्ष्यों को सबूत के तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता। इसके अतिरिक्त पहचान मेमो में गवाहों द्वारा आरोपी दीपक रावत की पहचान को लेकर दिए गए बयानों में भी विरोधाभास पाया गया।

अदालत ने यह भी गौर किया कि इस मामले में कोई भी चश्मदीद गवाह अभियोजन पक्ष के समर्थन में नहीं खड़ा हुआ। कई महत्वपूर्ण गवाहों ने मुकरते हुए कहा कि पुलिस ने उनसे जबरन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए थे। चश्मदीद साक्ष्यों की कमी के कारण अभियोजन की कहानी पूरी तरह से कमजोर साबित हुई।

हथियारों की बरामदगी को लेकर भी न्यायालय ने गंभीर टिप्पणी की। फैसले में कहा गया कि जोनी और विशाल के पास से पिस्तौल की बरामदगी सार्वजनिक और खुले स्थानों से हुई थी जिस पर किसी का भी नियंत्रण हो सकता था। कानून के अनुसार सार्वजनिक स्थानों से हुई ऐसी बरामदगी को आरोपी के खिलाफ निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।

फोरेंसिक रिपोर्ट के संबंध में अदालत ने पाया कि शव से निकाली गई गोलियों की सुरक्षित अभिरक्षा की कडिय़ों में स्पष्ट अंतराल था। पुलिस यह साबित नहीं कर सकी कि डाक्टर द्वारा सौंपी गई गोलियां मजिस्ट्रेट तक पहुंचने और फोरेंसिक लैब भेजे जाने तक पूरी तरह सुरक्षित और सीलबंद थीं। इस खामी के कारण फोरेंसिक रिपोर्ट का लाभ अभियोजन को नहीं मिला।

मृतक सुमित पटवाल द्वारा पूर्व में लिखी गई एक चिट्ठी को भी अदालत ने दुश्मनी का आधार मानने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि केवल हस्ताक्षर की पहचान कर लेने से दस्तावेज के भीतर लिखी गई बातों की सत्यता प्रमाणित नहीं हो जाती, विशेषकर तब जब वह एक फोटोकॉपी दस्तावेज हो।

न्यायालय ने माना कि इस मामले में घटनाओं की श्रृंखला अधूरी है और संदेह का लाभ आरोपियों को मिलना चाहिए। इसी के साथ ही अदालत ने तीनों अपीलकर्ताओं को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया है।

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