नयी दिल्ली , फरवरी 05 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को 51,000 से अधिक घर खरीदारों को बड़ी राहत देते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सरकारी कंपनी नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) को कर्ज में डूबी रियल एस्टेट कंपनी सुपरटेक लिमिटेड की 16 रुकी हुई आवास परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया गया था।
न्यायालय ने घर खरीदारों के हितों की रक्षा को सर्वोपरि मानते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करके व्यापक निर्देश जारी किए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने एनसीएलएटी के 12 दिसंबर, 2024 के आदेश की पुष्टि की। पीठ ने कहा कि परियोजनाओं को पूरा करने के लिए एनबीसीसी को जिम्मेदारी सौंपना न तो अनुचित था और न ही दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के प्रावधानों के विपरीत। न्यायालय ने उल्लेख किया कि उसने इससे पहले फरवरी 2025 में न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक लगा दी थी।
सुपरटेक ने 2010-12 की अवधि के दौरान लगभग 51,000 आवासीय इकाइयां बुक की थीं, लेकिन देरी और कंपनी के वित्तीय संकट के कारण हजारों घर खरीदार अधर में लटक गए थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सुपरटेक के वित्तीय और परिचालन लेनदारों के बकाया पर तभी विचार किया जा सकता है, जब खरीदारों को पूरी तरह से निर्मित और सुसज्जित घर सौंप दिए जाएं।
पीठ ने निर्देश दिया कि तैयार घरों में पानी और बिजली की आपूर्ति, सीवेज कनेक्शन, सड़कों और पार्कों के विकास सहित सभी वादा की गई सुविधाएं शामिल होनी चाहिए। एनबीसीसी को निर्देश दिया गया कि वह एनसीएलएटी द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार किए गए रोडमैप के अनुसार परियोजनाओं को तेजी से पूरा करे।
उच्चतम न्यायालय ने आगे के विलंब को रोकने के लिए सभी न्यायाधिकरणों और उच्च न्यायालयों को ऐसा कोई भी आदेश पारित करने से रोक दिया जो एनबीसीसी द्वारा किए जाने वाले निर्माण कार्य में बाधा या हस्तक्षेप पैदा कर सकता हो। एनसीएलएटी की कार्यवाही यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा शुरू की गई दिवाला कार्यवाही में एनबीसीसी द्वारा दायर एक आवेदन से शुरू हुई थी।
न्यायाधिकरण ने 12 दिसंबर, 2024 के अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि एनबीसीसी रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम (रेरा) के अनुपालन सहित सभी वैधानिक आवश्यकताओं के लिए बाध्य रहेगी।
न्यायाधिकरण ने उच्चतम न्यायालय के 'विक्रम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामले के फैसले का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक विश्वास का सिद्धांत राज्य और उसकी संस्थाओं को घर खरीदारों के हितों की रक्षा के लिए सकारात्मक कार्रवाई करने के लिए बाध्य करता है।
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