नयी दिल्ली , जनवरी 06 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल के कुछ अल्पकालिक (पार्ट-टाइम) शिक्षकों को यह अनुमति दी कि वे राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव के समक्ष नया प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकें, जिसमें वे गैर-सरकारी सहायता प्राप्त उच्च माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत पूर्ण-कालिक शिक्षकों के समान वेतन (वेतन समानता) की मांग कर सकें।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निर्देश दिया कि यदि यह प्रतिवेदन दाखिल किया जाता है, तो उस पर कानून के अनुसार विचार किया जाए और चार महीने के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित कर निर्णय लिया जाए।

अदालत में निर्णय का प्रभावी (ऑपरेटिव) हिस्सा पढ़ते हुए न्यायमूर्ति मेहता ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट प्रदान की कि वे छह सप्ताह के भीतर सचिव के समक्ष प्रस्तुत हो सकते हैं और पूर्व में दिए गए उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुरूप अपनी शिकायतें, दावे और अधिकार रिकॉर्ड पर रख सकते हैं।

न्यायालय ने आगे निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को प्रतिनिधि रूप में सुनवाई का अवसर दिया जाए और संबंधित स्कूलों से उनकी नियुक्ति से जुड़े रिकॉर्ड मंगवाकर जांच की जाए। यदि निर्णय प्रतिकूल होता है, तो याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध उपचारों का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र होंगे।

ऑपरेटिव निर्देश पढ़े जाने के बाद न्यायमूर्ति नाथ ने टिप्पणी की, "यहां मत आओ! उचित मंच पर जाओ।"यह मामला तब शुरू हुआ जब राज्य सरकार ने 28 जुलाई 2010 को एक आदेश पारित किया, जिसमें संविदा पर रखे गये अल्पकालिक शिक्षकों को 10 दिनों की आकस्मिक अवकाश और 10 दिनों की चिकित्सा अवकाश का लाभ दिया गया, बशर्ते वे नियमित पूर्णकालिक शिक्षकों की तरह प्रति सप्ताह समान संख्या में कक्षाएं लें।

भेदभावपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाते हुए कुछ अल्पकालिक शिक्षकों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की, जिसमें नियमित शिक्षकों के साथ समानता की मांग की गई, जिसमें समान कार्य के लिए समान वेतन भी शामिल था।

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