सिलीगुड़ी , अप्रैल 11 -- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण (23 अप्रैल) से पहले सिलीगुड़ी एक बार फिर उत्तर बंगाल की सबसे चर्चित सीट बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 अप्रैल को यहां दौरे से पहले ही चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा चुका है।

इस बार मुकाबला तृणमूल कांग्रेस के गौतम देव और भारतीय जनता पार्टी के शंकर घोष के बीच बेहद कड़ा माना जा रहा है।

2021 के चुनाव में श्री शंकर घोष ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) छोड़कर भाजपा का दामन थामा और तेजी से एक मजबूत स्थानीय नेता के रूप में उभरे। उस समय भाजपा के पास मजबूत संगठन तो था, लेकिन लोकप्रिय चेहरा नहीं, जिस कमी को श्री घोष ने पूरा किया।

वहीं, तृणमूल कांग्रेस को बाहरी उम्मीदवार उतारने के कारण आलोचना झेलनी पड़ी थी, जिसका फायदा भाजपा को मिला। लेकिन 2026 में समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पांच साल विधायक और विधानसभा में मुख्य सचेतक रहने के बाद अब श्री शंकर घोष के सामने अपनी सीट बचाना बड़ी चुनौती है।

श्री गौतम देव, जो पूर्व मंत्री, दो बार विधायक और वर्तमान मेयर हैं, अपने प्रशासनिक अनुभव और स्थानीय पकड़ के दम पर इस मुकाबले को बराबरी का बना रहे हैं।

एक समय श्री अशोक भट्टाचार्य के नेतृत्व में सिलीगुड़ी में वामपंथ का दबदबा था, लेकिन 2021 में उनका वोट बैंक काफी घटा। फिर भी, वाम दल अब भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।

इस चुनाव में राजनीतिक ध्रुवीकरण, शिक्षा और भर्ती घोटालों के आरोप, स्थानीय बनाम बाहरी उम्मीदवार का मुद्दा और भाजपा विरोधी वोटों का एकजुट होना जैसे कई मुद्दे अहम भूमिका निभा सकते हैं।

इसके अलावा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भी विवाद है। भाजपा का मानना है कि इससे अवैध वोट हटेंगे, जबकि तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि इससे असली मतदाताओं में नाराजगी बढ़ी है।

सिलीगुड़ी सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह नेपाल और भूटान की सीमाओं के पास स्थित है और पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार माना जाता है। यहां का 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक) देश के लिए बेहद अहम है।

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