नयी दिल्ली , फरवरी 05 -- उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 35(3) के तहत नोटिस देना उन मामलों में अनिवार्य है जिसमें आरोपी पर सात साल तक की कैद की सजा वाले अपराध का आरोप है और इन मामलों में गिरफ्तारी एक अपवाद है।
न्यायालय इस मुद्दे की जांच कर रहा था कि क्या सात साल तक की सजा वाले सभी मामलों में धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि सात साल से कम कारावास की सजा वाले अपराधों के लिए तब तक कोई गिरफ्तारी नहीं की जा सकती, जब तक कि बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी नहीं कर दिया जाए।
न्यायालय के अनुसार, हिरासत में लेना तब आवश्यक है जब वह कम से कम एक निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए हो, जैसे कि और अपराधों को रोकना, उचित जांच सुनिश्चित करना, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ रोकना, गवाहों की रक्षा करना, या अदालत के समक्ष आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करना। पीठ ने स्पष्ट किया कि एक वैध गिरफ्तारी के लिए धारा 35(1)(बी)(i) का पालन और धारा 35(1)(बी) के तहत कम से कम एक आवश्यक शर्त का होना अनिवार्य है।
इन शर्तों के पूरा होने पर भी गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं है। इसके बाद भी पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी का निर्णय लेने में अपना विवेक का इस्तेमाल कर सकता है। न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि गिरफ्तारी करने और न करने के दोनों ही निर्णयों के कारणों को लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने गिरफ्तारी के बदले आरोपी के उपस्थित होने का प्रावधान करने वाले बीएनएसएस की धारा 35(3) का उल्लेख करते हुए कहा कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए इस प्रावधान को धारा 35(1)(बी) और इसके प्रावधानों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। जब तक कोई आरोपी नोटिस का पालन करता है और अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होता है, उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, जैसा कि बीएनएसएस की धारा 35(5) के तहत निर्धारित है।
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