नयी दिल्ली , नवंबर 17 -- उच्चतम न्यायालय ने अडानी ग्रुप को संपत्ति बेचने की अनुमति मांगने वाली सहारा कंपनी की याचिका पर सुनवाई छह सप्ताह के लिए टाल दी है। कंपनी ने महाराष्ट्र स्थित एम्बी वैली परियोजना और लखनऊ स्थित सहारा शहर सहित 88 संपत्तियों को अडानी प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड को बेचने की अनुमति देश की शीर्ष अदालत से अनुमति मांगी थी।
भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और एमएम सुंदरेश की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगे जाने पर चार सप्ताह का समय दिया। अब मामले की सुनवाई छह सप्ताह बाद के लिए निर्धारित की गई है।
अदालत ने सहारा कर्मचारियों द्वारा समूह की कंपनियों से अपने लंबित वेतन जारी करने की मांग वाली याचिकाओं पर भी सुनवाई स्थगित कर दी। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहारा की ओर से पेश हुए। सॉलिसिटर जनरल ने यह भी आग्रह किया कि इस मामले में सहकारिता मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया जाए क्योंकि इससे कई सहकारी समितियां प्रभावित हुई हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र के रूप में कार्यरत शेखर नफड़े ने अदालत को सूचित किया कि उन्हें सहारा द्वारा उजागर न की गई कई संपत्तियों पर दावे प्राप्त हो रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सहारा को अपनी संपत्तियों का पूरा विवरण एक आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया जाए। लेकिन अदालत ने सोमवार को इस अनुरोध पर कोई निर्देश जारी नहीं किया।
अदालत ने पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) से संपत्तियों को बेचने की अनुमति के सहारा के अनुरोध पर जवाब मांगा था।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि संपत्तियों पर अधिकार का दावा करने वाले पक्ष न्यायमित्र के समक्ष अपने दावे प्रस्तुत करें। अदालत ने निर्देश दिया कि न्यायमित्र विवादित संपत्तियों, दावों से मुक्त संपत्तियों और अस्पष्ट स्वामित्व वाली संपत्तियों की पहचान करते हुए एक वर्गीकरण चार्ट तैयार करेगा।
अदालत ने सहारा को अपने कर्मचारियों के लंबित वेतन दावों की जांच करने का निर्देश दिया। सहारा ने दलील दी कि सेबी बार-बार प्रयास करने के बावजूद कुर्क की गई संपत्तियों की नीलामी नहीं कर पाया है। अपने संस्थापक सुब्रत रॉय के निधन के बाद संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान की उसकी क्षमता कमजोर हो गई है।
कई संपत्तियां कई आदेशों के अधीन हैं, जिनकी बिक्री के लिए अदालत की अनुमति आवश्यक है। अदाणी प्रॉपर्टीज के साथ 88 संपत्तियों की बिक्री के लिए एक टर्म शीट पर जो हस्ताक्षर किए गए हैं वह अदालत की मंजूरी के अधीन है। इससे प्राप्त राशि का उपयोग बकाया देनदारियों को पूरा करने के लिए किया जाएगा।
यह मुकदमा लंबे समय से चल रहे सहारा-सेबी मामले से उपजा है, जिसमें सहारा की संस्थाओं को 2012 में वैकल्पिक रूप से पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर (ओएफसीडी) खरीदने वाले निवेशकों को धन वापसी के लिए 24,000 करोड़ रुपये से अधिक जमा करने का निर्देश दिया गया था। सहारा का दावा है कि उसने पर्याप्त राशि जमा कर दी है, जबकि सेबी का कहना है कि 9,000 करोड़ रुपये से अधिक अभी भी बकाया है।
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