श्रीनगर , अक्टूबर 28 -- जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने मंगलवार को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विधायक वहीद पारा की ओर से पेश निजी विधेयक को खारिज कर दिया।
इस विधेयक में केंद्र शासित प्रदेश के निवासियों के लिए निर्मित सरकारी घरों के संपत्ति अधिकारों को मान्यता देने के लिए विशेष प्रावधान करने की मांग की गई थी।
विधेयक में कहा गया है,"राज्य की भूमि, कचरिया भूमि, सार्वजनिक भूमि और शमीलात भूमि (जम्मू-कश्मीर कृषि सुधार अधिनियम, 1976 की धारा 4) पर निर्मित घरों के मालिकाना हक़ को मान्यता देने के लिए केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के निवासियों के लिए विशेष प्रावधान प्रदान करने वाला एक विधेयक जिसमें देश के संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त आश्रय के अधिकार के हित में ऐसी भूमि पर कब्ज़ा करने वाले जम्मू-कश्मीर के ऐसे मालिकाना हक़ के अधिकारों को सुरक्षित किया जाएगा और उससे जुड़े या उसके आनुषंगिक मामलों के लिए प्रावधान किए जाएंगे।"मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस विधेयक का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि इस तरह का कदम एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा उतना सरल नहीं है जितना दिख रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली सरकारें 1996 से 2002 तक तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के कार्यकाल के दौरान शुरू की गई रोशनी योजना के जरिए इस मामले से निपट चुकी थीं। इस योजना का उद्देश्य लीजहोल्ड जमीन को फ्रीहोल्ड अधिकारों में बदलना था जिससे प्राप्त राशि बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल की जाती थी-इसलिए इसका नाम 'रोशनी' रखा गया।
श्री अब्दुल्ला ने कहा कि गुलाम नबी आज़ाद के नेतृत्व वाली पीडीपी-कांग्रेस सरकार ने आतंकवाद-पूर्व लीजधारकों पर लगी समय सीमा हटा दी और सभी लीजधारकों को फ्रीहोल्ड अधिकार प्रदान किए। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में राजनीति भी शामिल हो गई, जिससे 'भूमि जिहाद' जैसे आरोप लगे। बाद में इस योजना को अदालत में चुनौती दी गई और सरकार इसका बचाव करने में विफल रही।
मुख्यमंत्री ने पूछा,"अब राज्य की जमीन उन लोगों को सौंपने का एक नया प्रस्ताव है जिन्होंने उस पर अतिक्रमण करके घर बना लिए हैं। इसे कैसे उचित ठहराया जा सकता है?" उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के कदम से और अधिक अवैध कब्ज़े को बढ़ावा मिल सकता है।
उन्होंने कहा,"सरकार के पास प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भूमिहीनों को ज़मीन आवंटित करने का प्रावधान पहले से ही है। लेकिन अतिक्रमणकारियों को ज़मीन का मालिकाना हक देना स्वीकार नहीं किया जा सकता।" उन्होंने विधायक से इस विधेयक को वापस लेने का आग्रह किया क्योंकि सरकार इसे स्वीकार नहीं कर सकती।
श्री पारा ने विधानसभा में तर्क दिया कि यह मुद्दा मानवीय है, राजनीतिक नहीं। इस प्रस्ताव पर श्री उमर के विरोध का जवाब देते हुए श्री पारा ने कहा कि श्री उमर अब्दुल्ला यह भूल गए हैं कि उनके दादा शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में ऐतिहासिक भूमि सुधारों की शुरुआत की थी।
उन्होंने कहा,"शेख साहब को शेर-ए-कश्मीर इसलिए कहा जाता था क्योंकि उन्होंने किसानों को ज़मीन दी थी। जमीन जम्मू-कश्मीर की राजनीति और लोगों की पहचान का केंद्र है।"उन्होंने सुंजवान, बठिंडी और पुलवामा जैसे इलाकों में चल रहे ज़मीन तोड़ने के अभियानों की आलोचना करते हुए कहा कि दशकों से वहां रह रहे परिवारों को बेदखल करने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल किया गया।
उन्होंने पूछा,"अगर आप भूमिहीनों को ज़मीन और बेघरों को घर दे सकते हैं तो आप उन लोगों का आशियाना कैसे छीन सकते हैं जिनके पास पहले से ही घर हैं?"श्री पारा ने भाजपा पर इस मुद्दे को 'भूमि जिहाद' बताकर सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगाया और सरकार से सहानुभूति के साथ इस पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने इसे जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक विरासत का हिस्सा बताते हुए कहा,"इससे सभी प्रभावित होते हैं, सिर्फ एक समुदाय नहीं। इस विधेयक पर बहस होनी चाहिए, खारिज नहीं।"मुख्यमंत्री उमर ने जवाब दिया कि पीडीपी ने कभी शेख अब्दुल्ला की विरासत को नहीं अपनाया और कहा कि अगर नेशनल कॉन्फ्रेंस को भाजपा से डर होता तो वे उसे सरकार में ले आते, जैसा कि पीडीपी ने 2014 में किया था।
श्री उमर ने कहा,"पीडीपी को हमें शेख अब्दुल्ला की विरासत याद दिलाने की जरूरत नहीं है। नेशनल कॉन्फ्रेंस इसके बारे में बेहतर जानती है।"श्री पारा की ओर से विधेयक वापस लेने से इनकार करने के बाद अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने इस पर मतदान कराया लेकिन इसे केवल तीन सदस्यों का समर्थन प्राप्त हुआ। विधेयक ध्वनिमत से गिर गया।
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने सरकार द्वारा विधेयक को अस्वीकार किए जाने को नेशनल कॉन्फ्रेंस का एक और यू टर्न बताया।
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