लखनऊ , जनवरी 21 -- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को कहा कि सदन में लगातार व्यवधान और नियोजित गतिरोध देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं। जब सदन बाधित होता है तो सबसे अधिक नुकसान उस नागरिक का होता है, जिसकी समस्या पर चर्चा होनी थी।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि व्यवधान नहीं, बल्कि चर्चा और बातचीत की संस्कृति को मजबूत करना समय की मांग है।
श्री बिरला उत्तर प्रदेश विधानसभा भवन, लखनऊ में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के समापन सत्र को सम्बोधित करने के बाद पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रहे थे। यह सम्मेलन 19 से 21 जनवरी तक आयोजित किया गया।
श्री बिरला ने कहा कि देश की विधायिकाओं को अधिक प्रभावी, उत्तरदायी और जनोपयोगी बनाने के लिए एक लेजिस्लेटिव इंडेक्स का निर्माण किया जाएगा, जिससे देशभर की विधानसभाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिल सके।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि राज्यों की विधानसभाओं में एक वर्ष में न्यूनतम 30 दिन बैठकें होना आवश्यक है ताकि जन अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को प्रभावी मंच मिल सके। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि हर दिन और हर क्षण होती है।
पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए श्री बिरला ने कहा कि वे केवल कार्यवाही संचालित करने वाले नहीं, बल्कि संविधान के प्रहरी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के संरक्षक होते हैं। उनकी निष्पक्षता, संवेदनशीलता और दृढ़ता ही सदन की दिशा तय करती है।
सम्मेलन में वर्ष 2047 तक ''विकसित भारत'' के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए छह महत्वपूर्ण संकल्प पारित किए गए। इनमें विधायिकाओं की भूमिका को सशक्त करना, राज्य विधायी निकायों की न्यूनतम बैठकों को सुनिश्चित करना, विधायी कार्यों में प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग, सहभागी शासन को बढ़ावा देना, डिजिटल टूल्स के माध्यम से क्षमता निर्माण तथा राष्ट्रीय विधायी सूचकांक विकसित करना शामिल है।
उन्होंने कहा कि सम्मेलन के दौरान पारित संकल्पों में कहा गया कि भारत की सभी विधायी संस्थाओं के पीठासीन अधिकारी अपने-अपने विधानमंडलों की कार्यप्रणाली को और अधिक सशक्त बनाने के लिए स्वयं को पुनः समर्पित करेंगे, ताकि ''विकसित भारत @2047'' के लक्ष्य की प्राप्ति में ठोस योगदान दिया जा सके।
उन्होंने कहा कि विधायी कार्यों के लिए उपलब्ध समय और संसाधनों का रचनात्मक व प्रभावी उपयोग करने पर बल दिया गया, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बन सकें।
उन्होंने कहा कि एक अन्य संकल्प में विधायी कार्यों की सुगमता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को लगातार सुदृढ़ करने का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य जनता और उनके प्रतिनिधियों के बीच प्रभावी संपर्क स्थापित करना तथा सार्थक सहभागी शासन को सुनिश्चित करना है।
उन्होंने बताया कि सम्मेलन में इस बात पर भी सहमति बनी कि डिजिटल टूल्स के माध्यम से विधायकों और विधायी संस्थाओं की क्षमता निर्माण की जाएगी, ताकि कानून निर्माण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, दक्ष और आधुनिक बन सके।
समापन सत्र में राज्य सभा के उपसभापति, उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति, उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
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