नयी दिल्ली , जनवरी 20 -- केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी ने मंगलवार को वाल्मीकि रामायण राम कथा की 233 साल पुरानी एक पांडुलिपि अंतर्राष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय को सौंप दी।

श्री वरखेड़ी ने यह पांडुलिपि प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय (पीएमएमएल) की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र को भेंट की। यह वाल्मीकि रामायण (तत्त्वदीपिका टीका सहित) की दुर्लभ पांडुलिपियों में एक है। श्री मिश्र ने वाल्मीकि रामायण की इस दुर्लभ पांडुलिपि को अयोध्या स्थित राम कथा संग्रहालय को दान देने की तारीफ की और इसे "राम भक्तों तथा अयोध्या स्थित मंदिर परिसर के लिए एक ऐतिहासिक क्षण" बताया।

आदि कवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित राम कथा और उस पर महेश्वर तीर्थ की शास्त्रीय टीका से युक्त यह पांडुलिपि संस्कृत (देवनागरी लिपि) में लिखी गई है। यह विक्रम संवत 1849 (1792 ईस्वी) की है और एक ऐतिहासिक महत्व की कृति बतायी गयी है। यह रामायण की एक दुर्लभ सुरक्षित पाठ परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है। इस संग्रह में रामायण महाकाव्य के पांच प्रमुख कांड - बालकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड और युद्धकांड - शामिल हैं, जो इतिहास की कथात्मक और दार्शनिक गहराई को दर्शाते हैं।

पहले नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन को अस्थायी रूप से सौंपी गयी पांडुलिपि को अब उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित अंतर्राष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय को स्थायी रूप से उपहार में दिया गया है।

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