, March 10 -- जनता दल (यू) के राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा कि श्री बिरला का दायित्व है कि वह इस लोकतंत्र के मंदिर के सम्मान की रक्षा करें। उन्होंने कहा कि विपक्ष बार-बार सदन की कार्यवाही में बाधा डालता है, विपक्ष जब सदन की गरिमा को तार-तार करता है, सदन के कामकाज में व्यवधान डालता है, तो वह देश की 140 करोड़ जनता के हकों पर कुठाराघात करता है। उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में विपक्ष के सदन के कामकाज में व्यवधान डालने से 3300 करोड़ रुपये बर्बाद हुए हैं।

श्री सिंह ने कहा के श्री बिरला के कार्यकाल में सदन के कामकाज के प्रतिशत का रिकॉर्ड बना है। उनके खिलाफ लाया गया प्रस्ताव संविधान की भावना को आहत करने वाला है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का विरोध कांग्रेस की विरासत है और संसद राजनीतिक मंच नहीं बन सकता। यह अविश्वास प्रस्ताव श्री बिरला पर दबाव बनाने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि विपक्ष के नेता के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाये।

शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के अरविंद सावंत ने कहा कि अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने से विपक्ष को खुशी नहीं हो रही है, लेकिन हालात ऐसे हो गये थे कि विपक्ष को मजबूर होना पड़ा। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष के अधिकार होते हैं, उनका इस्तेमाल तो उचित है, लेकिन अधिकार का मतलब 'मेरी मर्जी' नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष चाहता है कि सदन चले, कानून से चले और व्यवस्था से चले।

श्री सावंत ने कहा कि सदन की कार्यवाही के संचालन के दौरान श्री बिरला के चेहरे पर खुशी भी देखी है, लेकिन उसे देखकर समझा जा सकता है कि वह कब और क्यों खुश होते हैं।

उन्होंने कहा कि एक सदस्य हैं, जो यहां बैठे हैं, उन्होंने सदन में एक पूर्व प्रधानमंत्री के लिए गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया, लेकिन उन्हें टोका नहीं गया। उस सदस्य ने यह भी नहीं देखा कि जिस पूर्व प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके पोता-पोती भी इस सदन में बैठे हैं। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री के लिए बड़े गैर जिम्मेदार शब्दों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन उन्हें कार्यवाही से निकाला भी नहीं गया।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देने वाले सत्ता पक्ष के सदस्यों से वह पूछना चाहते हैं कि सदन में उपाध्यक्ष का पद क्यों खाली है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की बात करने वालों से वह जानना चाहते हैं कि पश्चिम एशिया के संकट पर वह सदन में चर्चा के लिए भी तैयार क्यों नहीं हो रहे। अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध से देश की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा, इसके लिए सत्ता पक्ष सदन में बात तक करना नहीं चाहता।

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