संयुक्त राष्ट्र , जनवरी 22 -- भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समयबद्ध सुधारों को लागू करने में हो रही देरी के प्रति आगाह करते हुए सुझाव दिया है कि अफ्रीका एवं एशिया प्रशांत को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए स्थायी तथा अस्थायी सीटों की संख्या बढ़ाकर 15 से 25 की जानी चाहिए ।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पी. हरीश ने बुधवार को जी-4 (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) की ओर से बयान देते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद में उन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए जिनका प्रतिनिधित्व नहीं है या बहुत कम है।
श्री हरीश ने कहा कि सुरक्षा परिषद में छह नए स्थायी सदस्य होने चाहिए, दो अफ्रीकी क्षेत्र से, दो एशिया प्रशांत से, एक लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों के समूह (ग्रुलैक) से और एक पश्चिमी यूरोपीय और अन्य देशों के समूह (विओग) से। साथ ही 4 या 5 अतिरिक्त अस्थायी सदस्य होने चाहिए, एक या दो अफ्रीका से, एक एशिया प्रशांत से, और एक-एक ग्रुलैक और पूर्वी यूरोपीय समूह (ईईजी) से।
गौरतलब है कि ग्रुलैक 33 मध्य अमेरिकी और कैरिबियाई देशों का एक क्षेत्रीय समूह है, जो मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र प्रणाली और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों के भीतर मानवाधिकार, पर्यावरण और सतत विकास जैसे वैश्विक मुद्दों पर आम सहमति और संवाद के लिए काम करता है।
विओग 28 पश्चिमी यूरोपीय और अन्य देशों का समूह है। इस समूह में अधिकांश पश्चिमी यूरोप के देश हैं, लेकिन उत्तरी अमेरिका, पूर्वी भूमध्यसागर और ओशिनिया के देश भी शामिल हैं।
भारत का यह सुझाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करने के एक दिन बाद आया है। श्री ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस' की स्थापना को उचित ठहराते हुए आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर पाया। उन्होंने कहा, ''अगर संयुक्त राष्ट्र ने और अधिक किया होता, तो बोर्ड ऑफ पीस की कोई आवश्यकता नहीं होती।
श्री हरीश ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता दिन-ब-दिन और स्पष्ट होती जा रही है। समय पर सुधार लागू करने में और देरी से दुख और कष्ट और भी बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि चल रहे संघर्षों की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, प्रतिदिन अनगिनत निर्दोषों की जान चली जाती हैं। उन्होंने कहा, ''हमारे पास बिना परिणाम वाले बैठकों में उलझे रहने का समय नहीं है। हमें सामूहिक रूप से हर पल का सदुपयोग करना चाहिए।''यह बताते हुए कि दुनिया अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है, राजदूत ने कहा कि लगभग हर दिन अलग-अलग प्रकार की चुनौतियां उभर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी सार्वभौमिक बहुपक्षीय संगठन भी इसका अपवाद नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि संगठन की विश्वसनीयता और प्रभावशिलता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। दुनिया भर में भीषण संघर्षों को सार्थक रूप से संबोधित करने में संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं इस स्थिति का एक प्रमुख कारण हैं, हालांकि यह बहुत व्यापक शक्ति समीकरणों का हिस्सा है।
श्री हरीश ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के मामले में संयुक्त राष्ट्र की कमियां स्वाभाविक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रभावशीलता की कमी से जुड़ी हैं।उन्होंने कहा कि एक संशोधित सुरक्षा परिषद में संतुलित भौगोलिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
राजदूत ने कहा कि वर्तमान भू-राजनैतिक आवश्यकताओं ने ही जी-4 को जन्म दिया है और यह हमेशा परिणाम-केंद्रित प्रक्रिया पर जोर देता रहा है। इस समूह ने हमेशा एक निर्धारित समय सीमा और मसौदे के आधार पर बातचीत को प्राथमिकता दी है। जी-4 एक समेकित मॉडल की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।
श्री हरीश ने कहा कि जी-4 मॉडल सुरक्षा परिषद में 'वैश्विक दक्षिण' के उचित प्रतिनिधित्व की भारी कमी को दूर करने के अनुरूप है। यह संयुक्त राष्ट्र में स्थापित मानदंडों पर आधारित है। उन्होंने कहा, ''हम छोटे द्वीप विकासशील देशों (एसआईडीएस) को उनकी निरंतर और पर्याप्त उपस्थिति के लिए अस्थायी श्रेणी में उचित प्रतिनिधित्व देने का भी समर्थन करते हैं।''उल्लेखनीय है कि एसआईडीएस छोटे द्वीप विकासशील राज्यों का एक समूह है, जिसमें 39 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश और 18 अन्य सहयोगी सदस्यों शामिल हैं।
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