रायसेन , फरवरी 13 -- मध्यप्रदेश में रायसेन जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक महत्व के रायसेन किला परिसर में स्थित शिव मंदिर वर्ष में केवल महाशिवरात्रि के दिन सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। मंदिर का ताला जिला प्रशासन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संयुक्त नियंत्रण में रहता है। मंदिर के मुख्य द्वार की एक चाबी प्रशासन के पास तथा दूसरी पुरातत्व विभाग के पास सुरक्षित रहती है।
पुरातत्वविद राजीवलोचन चौबे ने अपनी पुस्तक युग युगीन रायसेन में उल्लेख किया है कि दुर्ग स्थित शिव मंदिर सहित देश के अनेक मंदिर मुस्लिम कालीन आक्रमणों के दौरान क्षतिग्रस्त हुए थे। आजादी के बाद भी मंदिर के द्वार पर गणेश प्रतिमा और दोनों ओर भग्न मूर्तियां स्पष्ट दिखाई देती थीं, जबकि शिवलिंग बाहर उपेक्षित अवस्था में पड़ा था। गर्भगृह पर पुरातत्व विभाग का ताला लगा था और प्रांगण में संस्कृत का शिलालेख भी विद्यमान था।
इसी स्थिति से आहत होकर वर्ष 1974 में स्वर्गीय कृष्णगोपाल माहेश्वरी की अध्यक्षता में रायसेन दुर्ग मंदिर खोलो संघर्ष समिति का गठन किया गया। इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि एक मंच पर आए और शांतिपूर्ण आंदोलन प्रारंभ किया।
उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाशचंद सेठी थे तथा केंद्र में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सरकार थी। संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन कलेक्टर ए. के. अग्रवाल को ज्ञापन सौंपकर जनभावना से अवगत कराया। कलेक्टर ने अपनी अनुशंसा के साथ मामला शासन को प्रेषित किया।
तत्कालीन अधीक्षणगण के. के. चक्रवर्ती ने भी अपनी रिपोर्ट में मांग को उचित बताया, हालांकि गुप्तचर विभाग ने साम्प्रदायिक तनाव की आशंका जताई थी। बाद में आंदोलन के प्रतिनिधियों ने भोपाल में विभिन्न नेताओं और अधिकारियों से भेंट कर विषय रखा। उस समय रायसेन में "किले के मंदिर को लेकर रहेंगे" जैसे नारे गूंज रहे थे और व्यापक जनसमर्थन दिखाई दे रहा था।
अंततः सरकार ने जनभावना को स्वीकार किया और शिवरात्रि के अवसर पर मुख्यमंत्री प्रकाशचंद सेठी स्वयं रायसेन पहुंचे। विशाल मेले के साथ मंदिर का ताला खोला गया तथा शिवलिंग की पुनर्स्थापना की गई। इसके बाद से प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि पर मंदिर खोले जाने और भव्य मेले के आयोजन की परंपरा जारी है। शेष दिनों में श्रद्धालुओं को बाहर से पूजा की अनुमति दी जाती है। इस आंदोलन में तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जाता है, जिन्होंने वस्तुस्थिति से शासन को अवगत कराकर समाधान का मार्ग प्रशस्त किया।
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