अमृतसर , अक्टूबर 30 -- पंजाब भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता एवं सिख चिंतक प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने गुरुवार को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और श्री अकाल तख्त साहिब सचिवालय से अपील की है कि वे गुरमत मर्यादा और पूर्व में जारी हुकमनामों की रोशनी में सिख संगत की यह शंका स्पष्ट करें कि क्या किसी व्यक्ति विशेष या साधु को शारीरिक असमर्थता के कारण गुरु दरबार में कुर्सी पर बैठने की अनुमति दी जा सकती है?प्रो. ख्याला ने कहा कि बीते कुछ दिनों से बठिंडा से संबंधित एक डेरा प्रमुख द्वारा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पास कुर्सी डालकर बैठने का मामला सिख जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस कृत्य पर सिख समाज का एक वर्ग गंभीर आपत्ति जता रहा है, जबकि उक्त साधु और उसके समर्थक अब तक इसे गलती मानकर क्षमायाचना करने के बजाय तर्क और दलीलों से इसे उचित ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि जैसे एक तख्त पर गुरु साहिब बिराजमान होते हैं और दूसरे पर कथावाचक या कीर्तनिये सिंह बैठते हैं, वैसे ही कुर्सी पर बैठना अनुचित नहीं है।
प्रो. ख्याला ने प्रश्न उठाया कि क्या ऐसी दलीलें गुरमत के मूल सिद्धांतों के अनुरूप हैं? कुछ गुरुद्वारों में पीछे के हिस्से में बुजुर्गों या असमर्थ संगत के लिए कुर्सियों या बेंचों की व्यवस्था देखी जाती हैं, ताकि वे गुरु साहिब के सम्मान को बनाये रखते हुए दर्शन कर सकें, परंतु गुरु ग्रंथ साहिब के बराबर कुर्सी डालकर बैठने की परंपरा पहले कभी नहीं रही। उन्होंने याद दिलाया कि 20 अप्रैल 1998 को पांच सिंह साहिबानों द्वारा जारी हुक्मनामे में स्पष्ट कहा गया था कि गुरु का लंगर केवल ज़मीन पर बैठकर ही ग्रहण किया जाये, यही गुरमत की रीति है। इसी तरह 24 अक्तूबर 2000 के हुक्मनामे में भी यह स्पष्ट किया गया था कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सम्मुख संगत को पूरा सत्कार रखते हुए चौकड़ी मारकर बैठना चाहिए। केवल शारीरिक असमर्थता की स्थिति में ही अलग प्रबंध किया जा सकता है, वह भी इस बात का ध्यान रखते हुए कि गुरु साहिब के मान-सम्मान में कोई कमी न आये। प्रो. ख्याला ने कहा कि मुख्य प्रश्न यह है कि क्या किसी विशेष व्यक्ति के लिए मर्यादा से छूट दी जा सकती है? वर्तमान विवाद के मामले में शिरोमणि कमेटी और श्री अकाल तख्त साहिब सचिवालय की चुप्पी सिख संगत में गंभीर संदेह पैदा कर रही है। क्या यह मौन इसलिए है, क्योंकि विवादित साधु ने हाल ही में अकाली दल और शिरोमणि कमेटी द्वारा ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज की तख्त श्री केसगढ़ साहिब और श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यकारी जत्थेदार के रूप में नियुक्ति के समर्थन में खुलकर बयानबाज़ी की थी।
उन्होंने कहा कि अधिकांश सिख संस्थाओं ने उस नियुक्ति और दस्तारबंदी को अनुचित ठहराया था? उन्होंने कहा कि यद्यपि उस साधु द्वारा किये गये जनसेवा कार्य प्रशंसनीय हैं, परंतु जब बात गुरमत मर्यादा और गुरु साहिब के सम्मान की हो, तो किसी के लिए भी विशेष छूट नहीं दी जा सकती। सिख परंपरा सदा समानता और आदर की रही है, जहां गुरु दरबार में सब संगत एक साथ बैठकर गुरु की वाणी सुनते हैं और पंगत में लंगर ग्रहण करते हैं। प्रो. ख्याला ने शिरोमणि कमेटी और श्री अकाल तख्त साहिब सचिवालय से अपील की कि वे गुरमत सिद्धांतों और हुक्मनामों की रोशनी में स्पष्ट संदेश जारी करें, ताकि सिख संगत में कोई भ्रम या विभाजन न उत्पन्न हो।
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