शिमला , जनवरी 07 -- हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार शिमला नगर निगम के महापौर और उप-महापौर के कार्यकाल के विवादास्पद विस्तार को लेकर एक गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक संकट में फंस गई है।
सरकार ने जिसे एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय के रूप में पेश किया था, वह अब एक कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक शर्मिंदगी में बदल गया है। इस विवाद के केंद्र में हिमाचल प्रदेश नगर निगम (संशोधन) अध्यादेश, 2025 है, जिसने महापौर और उप-महापौर के कार्यकाल को निर्धारित अवधि से बढ़ाने की कोशिश की थी। हालांकि, इस अध्यादेश की अवधि केवल छह महीने की थी।
अध्यादेश की अवधि समाप्त होने के बाद, राज्य सरकार इसे एक नियमित अधिनियम के साथ बदलने में विफल रही। विधानसभा ने हालांकि विधेयक पारित कर दिया था, लेकिन राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने विधेयक को अपनी सहमति नहीं दी, जिससे सरकार के पास विस्तार को जारी रखने के लिए कोई वैधानिक समर्थन नहीं बचा। इसलिए महापौर और उप-महापौर का कार्यकाल कानूनी रूप से नहीं बढ़ाया जा सका। फिर भी वर्तमान पदाधिकारी पद पर बने हुए हैं, जो संवैधानिक औचित्य और नगर निगम अधिनियम के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। इसने सुक्खू सरकार को स्थापित कानून की स्पष्ट अवहेलना करने के आरोपों के घेरे में ला दिया है।
यह मामला वर्तमान में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की जांच के दायरे में है, जहां राज्य सरकार के आचरण के कारण मामला और अधिक विवादों के घेरे में आ गया है। अपना रुख स्पष्ट करने के बजाय सरकार ने बार-बार समय की मांग की है और उचित जवाब दाखिल करने में विफल रही है। उच्च न्यायालय ने इस टालमटोल वाले रवैये को देखते हुए आपत्तियों को दूर न करने और कार्यवाही में देरी करने के लिए राज्य पर पचास हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।
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