कोंडागांव , अप्रैल 18 -- छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्थित कोंडागांव में शिक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति बच्चों को जागरूक करना एक सराहनीय कदम है शासकीय हाई स्कूल हात्मा के व्याख्याता संदीप कुमार सेन ने जल संरक्षण को लेकर ऐसी अनूठी पहल की है, जो न केवल स्कूल में पानी की बर्बादी को रोक रही है, बल्कि छात्रों को भविष्य के लिए जिम्मेदार नागरिक भी बना रही है। उनके द्वारा लागू किए गए प्रयोग न केवल प्रभावी हैं, बल्कि अन्य विद्यालयों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं।इस पहल का मूल मंत्र "जल है तो कल है, और इसकी बचत ही इसका हल है।"जल संरक्षण के अनूठे प्रयोग शिक्षक सेन ने विद्यालय में जल की हर बूंद को बचाने के लिए तीन प्रमुख प्रयोग लागू किए हैं: 'वॉटर बेल' विद्यालय में दिन में दो से तीन बार एक विशेष घंटी बजाई जाती है, जो छात्रों के लिए पानी पीने का संकेत है। इससे छात्र पूरे दिन हाइड्रेटेड रहते हैं और उनकी एकाग्रता बनी रहती है। साथ ही, इससे छात्रों को यह भी पता चलता है कि उन्हें अपनी बोतल का पानी कब और कैसे समाप्त करना है, जिससे अनावश्यक पानी की बर्बादी रुकती है।

'बाकी पानी' का सदुपयोग प्रायः बच्चे स्कूल की छुट्टी के समय अपना बचा हुआ पानी फेंक देते हैं। इस बर्बादी को रोकने के लिए विद्यालय के निकास द्वार पर एक बड़ा "जल पात्र" (बाल्टी) रखा गया है। छात्र घर जाते समय अपनी बोतल का बचा हुआ जल इस पात्र में डाल देते हैं। एकत्रित जल का उपयोग विद्यालय के माली द्वारा पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता है, जिससे स्कूल परिसर की हरियाली भी बनी रहती है।

'जल प्रहरी' छात्रों में जिम्मेदारी का भाव पैदा करने के लिए 'जल प्रहरी' टीम का गठन किया गया है। इन नन्हे रक्षकों का काम लंच ब्रेक और छुट्टी के समय विद्यालय परिसर में निगरानी करना है। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई नल खुला न रह जाए और कहीं किसी पाइप से पानी का रिसाव तो नहीं हो रहा है।

शिक्षक सेन के इस नेतृत्व की ग्रामीण और अभिभावक मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे हैं। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसे प्रयोग न केवल संसाधनों को बचा रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बना रहे हैं।

विद्यालय की इस पहल पर टिप्पणी करते हुए शिक्षाविदों ने कहा कि यदि हर विद्यालय इस प्रकार के छोटे-छोटे प्रयोगों को अपना ले, तो देश में जल संकट की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है।

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