जालंधर , जनवरी 15 -- केंद्र सरकार के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए लाए गए 'शांति एक्ट 2025' की ऑल इंडिया पावर इंजीनियर एसोसिएशन ने कड़ी आलोचना की है।
एसोसिएशन के प्रवक्ता वी.के. गुप्ता ने गुरुवार को कहा कि एटॉमिक एनर्जी एक्ट 1962 और सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट 2010 की जगह लाया गया यह नया कानून सुरक्षा और जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं से समझौता कर केवल निवेश को प्राथमिकता देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इतने गंभीर कानून को बिना किसी सेलेक्ट कमेटी की जांच के, विपक्ष के विरोध और वॉकआउट के बीच जल्दबाजी में पारित कर दिया है।
गुप्ता के अनुसार, नए कानून में सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) की जिम्मेदारी को पूरी तरह हटा दिया गया है और केवल ऑपरेटरों की जवाबदेही तय की गई है, वह भी प्लांट की क्षमता के आधार पर सीमित है न कि दुर्घटना से होने वाले वास्तविक नुकसान के आधार पर। आलोचकों का तर्क है कि ऑपरेटर की जिम्मेदारी को 100 करोड़ से 3,000 करोड़ रुपये तक सीमित करना 'पॉल्यूटर पेज़ प्रिंसिपल' का उल्लंघन है और यह 1984 की भोपाल गैस त्रासदी जैसे कड़वे अनुभवों से सीख न लेने जैसा है। यदि किसी बड़े रिएक्टर में दुर्घटना होती है, तो उसके रेडियोएक्टिव प्रभाव से लाखों लोगों की जान जा सकती है और वर्षों तक आर्थिक व कृषि गतिविधियां ठप हो सकती हैं, ऐसी स्थिति में जवाबदेही की यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
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