(नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार से)नयी दिल्ली , जनवरी 01 -- नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने हाल ही में बने नए अधिनियम वीबी-जीरामजी को लेकर कहा है कि इसके बारे में विपक्ष और कुछ टिप्पणीकार जो बातें कर रहे हैं वे निराधार हैं।

उन्होंने कहा " मनरेगा के स्थान पर बनाये गये नए कानून को लेकर बहस को नाम बदलने पर केंद्रित करना और ग्रामीण रोजगार गारंटी के लिए वीबी-जीरामजी कानून में निहित बदलाव के सार पर चर्चा न करना केवल भटकाव है। मैं यहाँ इस लेख के माध्यम से वीबी-जीरामजी कानून के बारे में कुछ निराधार डरों को दूर करना चाहता हूँ।"उन्होंने कहा कि पहला डर यह है कि राज्य सरकारों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने से वीबी-जीरामजी योजना को वित्तीय बाधाओं का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि राज्य अपने हिस्से का योगदान नहीं कर पाएंगे। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों (कुल 13) को अभी भी केंद्र सरकार से कुल परिव्यय का 90 प्रतिशत प्राप्त होगा। शेष राज्यों की उच्च हिस्सेदारी यह सुनिश्चित करेगी कि राज्य सरकारें, जिनकी अब इस योजना में सक्रिय भागीदारी है, वीबी-जीरामजी के उचित कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने और उन कमियों (लीकेज) को दूर करने के लिए अधिक प्रयास करेंगी। राज्यों को अपने लोगों के लिए एक व्यवहार्य सामाजिक सुरक्षा जाल प्रदान करने के मामले में लगभग बराबर का भागीदार बनाने का यह प्रयास हमारी राजव्यवस्था की संघीय प्रकृति के पूरी तरह अनुरूप है।

दूसरा यह कि कुछ नागरिक सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि रोजगार गारंटी को 'मांग आधारित' प्रारूप से 'नियम-आधारित खर्च' प्रारूप में बदलने से ग्रामीण बेरोजगारों की जरूरतें पूरी नहीं हो पाएंगी। ये आलोचक भूल रहे हैं कि केवल धन साझा करने के पैटर्न को बदलने से गारंटी प्रभावित नहीं होने वाली, काम मांगने का श्रमिक का अधिकार बरकरार है। यदि 15 दिनों के भीतर रोजगार प्रदान नहीं किया जाता है, तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाना अभी भी आवश्यक है।

तीसरा यह कि प्रत्येक राज्य की वास्तविक जरूरतों की गहन जांच के आधार पर उनके लिए निर्धारित खर्च यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य सरकारें वार्षिक खर्च के प्रति पूरी तरह जागरूक हों। इससे वे कम काम वाले महीनों के दौरान रोजगार के नुकसान से निपटने के लिए वीबी-जीरामजी के कार्यान्वयन को और बेहतर बना सकेंगी। राज्य सरकारों को बुवाई और कटाई के दौरान साल में 60 दिनों के लिए इस योजना के कार्यान्वयन को रोकने का प्रावधान एक सुविचारित निर्णय है। यह प्रावधान कृषि मौसम के दौरान श्रमिकों की कमी को दूर करने में मदद करेगा ताकि आवश्यक कृषि कार्य पूरा हो सके।

उन्होंने कहा कि चौथी बात यह है कि महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों और जलवायु से संबंधित परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना एक स्वागत योग्य कदम है। भारत दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी और वैश्विक ताजे पानी की उपलब्धता के केवल चार प्रतिशत हिस्से के साथ जल संकट से गंभीर रूप से जूझ रहा देश है। पिछले दशकों में हमारी प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता काफी तेजी से कम हुई है। इसलिए, वर्षा जल संचयन, जल धारण क्षमता बढ़ाने के लिए तालाबों और जलाशयों से गाद हटाना (ड्रेजिंग) और सभी जल संरक्षण परियोजनाओं पर ध्यान देना एक गंभीर उभरती समस्या का समाधान करेगा। वास्तव में, पानी की समस्या की तात्कालिकता और गंभीरता को देखते हुए, अगले कुछ वर्षों के लिए वीबी-जीरामजी का लगभग विशेष रूप से जल संरक्षण और इसके तर्कसंगत उपयोग पर ध्यान केंद्रित करना बेहद उपयोगी हो सकता है। इससे अच्छे और जवाबदेह परिणाम मिलेंगे।

पांचवां यह कि वीबी-जीरामजी के तहत शुरू की गई परियोजनाओं को 'नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक' और 'पीएम गति शक्ति' से जोड़ने तथा चार प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ इन परियोजनाओं को 'विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं' का हिस्सा बनाने से निवेश का बेहतर लाभ सुनिश्चित होगा। नए अधिनियम में परिकल्पित की गयी योजना विकेंद्रीकृत और सहभागी है तथा नीचे से ऊपर की ओर (बॉटम-अप) की दृष्टिकोण अपनाती है।

'नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक' में ग्राम पंचायतों द्वारा तैयार किये गए और पूरा किये गये कार्यों का संग्रह होगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि बुनियादी ढांचा परियोजनाएं न केवल ग्राम पंचायतों द्वारा तैयार की गई विकेंद्रीकृत विकास योजनाओं का हिस्सा हों, बल्कि लॉजिस्टिक बुनियादी ढांचे में सुधार करने और कृषि क्षेत्र के साथ-साथ समग्र अर्थव्यवस्था के लिए लागत कम करने के राष्ट्रीय स्तर के प्रयास के साथ मेल भी खाती हों। ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार और इसे लॉजिस्टिक नेटवर्क से जोड़ने से श्रम गतिशीलता और वस्तुओं तथा सेवाओं के हस्तांतरण में सुविधा होगी, जिससे ग्रामीण कार्यबल और किसानों को सीधा लाभ होगा।

छठा, हालांकि रिसाव (लीकेज) को रोकने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है (2024-25 में 99.94 प्रतिशत भुगतान पहले से ही डिजिटल है), लेकिन सभी संभावित कमियों और गलतियों को दूर करने का प्रयास वास्तव में स्वागत योग्य है। इन प्रयासों में केंद्रीय और राज्य स्तर पर संचालन निगरानी समितियों की नियुक्ति, परियोजनाओं के कार्यान्वयन की नियमित निगरानी के लिए एक कार्यक्रम अधिकारी, एआई आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली, पंचायतों की बढ़ी हुई निगरानी भूमिका, मोबाइल-आधारित निगरानी के लिए जीपीएस और साप्ताहिक सार्वजनिक खुलासे शामिल हैं।

उन्होंने बताया "मेरी राय में, सबसे महत्वपूर्ण सुधार साल में दो बार कड़े सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) का प्रावधान है। यह उन शेष कमजोरियों को खत्म करने की कुंजी हो सकता है जिन्होंने मनरेगा के कार्यान्वयन को प्रभावित किया था। मनरेगा के बीस वर्षों के अनुभव ने कई सबक दिए हैं। यदि इन सीखों को वीबी-जीरामजी के साथ ग्रामीण भारत की बदली हुई वास्तविकताओं के अनुरूप शामिल नहीं किया जाता, तो यह एक लापरवाही होती।

वीबी-जीरामजी को डिजिटल ढांचे के भीतर मजबूती से स्थापित करके और स्पष्ट नियमित निगरानी तंत्र बनाकर, हम उम्मीद कर सकते हैं कि फर्जी सूची, बढ़ा-चढ़ाकर किए गए रोजगार के दावे, भुगतान की देरी और रिसाव कम से कम होंगे और अंततः समाप्त हो जाएंगे। इससे वीबी-जीरामजी को वह सामाजिक सुरक्षा जाल बनाने में मदद मिलेगी जो संकट और रोजगार के अप्रत्याशित नुकसान के समय लोगों को सहायता प्रदान करेगा।

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