चेन्नई , फरवरी 22 -- भारत ने क्लिनिकल देखभाल, विस्तारित टीकाकरण कवरेज और सुदृढ़ निगरानी व्यवस्था की बदौलत पिछले एक दशक में एन्सेफेलाइटिस (मस्तिष्क शोथ) की रोकथाम और प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) एन्सेफेलाइटिस इंटरनेशनल (ईआई) ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है।
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि यह प्रगति असमान रही है। बीमारी की देर से पहचान तथा निदान के कारण अब भी रोकी जा सकने वाली मौतें और दीर्घकालिक तंत्रिका संबंधी अक्षमताएं सामने आ रही हैं।
विश्व एन्सेफेलाइटिस दिवस 2026 के अवसर पर ईआई ने एन्सेफेलाइटिस की शीघ्र पहचान पर नये सिरे से जोर देने का आह्वान किया है। यह मस्तिष्क की संभावित घातक सूजन की स्थिति है, जो किसी को भी प्रभावित कर सकती है। यह अक्सर आम बुखार जैसे लक्षणों से शुरू होती है, जिन्हें कई बार नजरअंदाज कर दिया जाता है।
ईआई की ओर से रविवार को जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एन्सेफेलाइटिस पर अपना पहला तकनीकी ब्रीफ जारी किया था, जिसमें इसे उभरता वैश्विक स्वास्थ्य खतरा मानते हुए देशों से निगरानी, टीकाकरण रणनीतियों, शीघ्र निदान, उपचार और जन-जागरूकता को मजबूत करने का आग्रह किया गया।
इस ब्रीफ से एन्सेफेलाइटिस को वैश्विक और राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंडे में प्रमुखता मिली, जिसमें भारत भी शामिल है, जहां अनुभव प्रगति के साथ-साथ नई चुनौतियों को भी दर्शाता है।
राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, एक्यूट एन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के रोगियों में मृत्यु दर 2015 में लगभग 12.3 प्रतिशत से घटकर 2022 में करीब 3.9 प्रतिशत रह गयी है, जो स्वास्थ्य प्रणाली की बेहतर प्रतिक्रिया और रोगी प्रबंधन में सुधार को दर्शाता है।
ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल उत्तर प्रदेश में 2018 से 2022 के बीच पाए गए जापानी एन्सेफलाइटिस (जेई) मामलों में लगातार गिरावट आई है, जिसका श्रेय मजबूत निगरानी और सरकार समर्थित बाल टीकाकरण कार्यक्रमों को दिया गया है। दूसरी ओर, बच्चों से वयस्कों की ओर जेई मामलों का झुकाव यह दर्शाता है कि बचपन के बाद प्रतिरक्षा में अंतर बना हुआ है और टीकाकरण कवरेज में चुनौतियां बनी हुई हैं।
हालिया भारतीय अध्ययनों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि एन्सेफेलाइटिस एक अकेली बीमारी नहीं है। उत्तरी भारत से 2025 में हुए एक संभावित अध्ययन में स्क्रब टायफस को एईएस का प्रमुख कारण पाया गया, जबकि चिकनगुनिया वायरस सबसे आम वायरल कारण के रूप में सामने आया। जैसे-जैसे निगरानी में सुधार हो रहा है और एईएस की परिभाषा व्यापक बन रही है, अन्य गंभीर संक्रामक कारणों का भी तेजी से पता चल रहा है, जिससे एन्सेफेलाइटिस का बोझ और जटिल हो गया है।
ईआई की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. एवा ईस्टन ने कहा, "डब्ल्यूएचओ के तकनीकी ब्रीफ ने एन्सेफेलाइटिस को वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडे पर लाने में मदद की है। भारत जैसे देशों में बेहतर क्लिनिकल देखभाल और टीकाकरण कार्यक्रमों के कारण जीवित रहने की दर में महत्वपूर्ण सुधार दिख रहा है, लेकिन प्रगति असमान है। बहुत से लोगों को अब भी गंभीर परिणाम झेलने पड़ते हैं क्योंकि एन्सेफेलाइटिस की समय पर पहचान नहीं हो पाती। जागरूकता ही सबसे बड़ी कड़ी है। चेतावनी संकेतों को पहचानना जीवन बचा सकता है।"उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर हर मिनट तीन लोग एन्सेफेलाइटिस से प्रभावित होते हैं, फिर भी लगभग 10 में से आठ लोग नहीं जानते कि यह क्या है, जिससे निदान और उपचार में खतरनाक देरी होती है। जागरूकता बढ़ाने के लिए ईआई ने "ब्रेन इन फ्लेम्स" अभियान शुरू किया है, जो एन्सेफेलाइटिस के सामान्य चेतावनी संकेतों को रेखांकित करता है।
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