नयी दिल्ली , मार्च 30 -- केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के प्रशासन में सामान्य सुधार से संबंधित विधेयक को राज्यसभा में विपक्ष ने संवैधानिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध तथा इन बलों के वरिष्ठ काडर के मनोबल को गिराने वाला बताते हुए इसका विरोध किया और इसे प्रवर समिति को भेजे जाने पर जोर दिया।
विपक्ष ने इस विधेयक को सदन में प्रस्तुत किये जाने के समय भी इन्हीं तर्कों के आधार पर इसका विरोध किया था।
केंद्रीय पुलिस बलों में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीए) के अधिकारियों की प्रति नियुक्ति के प्रावधान और इन बलों की सेवा शर्तों एकीकृत व्यवस्थाओं के प्रावधान वाले इस विधेयक का विरोध करते हुए विपक्षी सदस्यों ने कहा कि इस विधेयक से न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारों के बीच स्थापित संवैधानिक संतुलन बिगड़ेगा। उन्होंने इसे संघीय व्यवस्था के भी विरुद्ध बताते हुए कहा कि इससे केंद्र के पास बहुत अधिक अधिकार केंद्रित हो जाएगे।
उनका कहना है कि इन बलों में आईपीएअधिकारियों की प्रतिनियुक्तियों की व्यस्था पर सरकार और संसदकी की कई समितियों ने प्रतिकूल टिप्पणियां की है और इसमें बदलाव की सिफारिशें की है। उच्चतम न्यायाल ने भी पिछले साल इस बार में प्रतिनियुक्ति को सीमिति करने का निर्देश दे रखा है और सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है।
कई विपक्षी सदस्यों ने यह भी कहा कि सरकार उनकी ओर प्रस्तुत संशोधनों को इसमें शामिल करे तो वे इसका समर्थन कर सकते हैं , अन्यथा इस महत्वपूर्ण विधेयक को विस्तृत चर्चा के लिए प्रवर समिति या संयुक्त समिति को भेज दिया जाना चाहिए।
सदन में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026 पांच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों , केंद्रीय रिजर्व पुलिस बिल, सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, और सशस्त्र सीमा बल के अधिकारियों से संबंधित कुछ मामलों को एकीकृत व्यवस्था के तहत विनियमित करने के लिए लाया गया है। वर्तमान में ऐसे मामले अलग-अलग संबंधित कानूनों के तहत आते । इन बलों में इंस्पेक्टर जनरल रैंक, एडिशनल डायरेक्टर रैंक और डायरेक्टर जनरल तथा स्पेशल डायरेक्टर जनरल रैंक के पदों पर आईपीएस अधिकारियों का कोटा निर्धारित करने का प्रावधाना ।
विधेयक पर चर्चा शुरू करते हुए तृणमूल कांग्रेस के नदीमुल हक ने कहा कि यह विधेयक महत्वपूर्ण है इस लिए दोनों सदनों में इस पर चर्चा के लिए 15 घंटे का समय आवंटित किया गया है पर यह इस प्रकार से लाया गया है वह खतरनाक है , उससे कई संवैधिक आशंकाएं उत्पन्न हुई हैं। सरकार इसके माध्य से संवैधानिक संधीय व्यवस्था को कमजोर करना चाहती है क्यों की इसमें शक्तियों को केंद्र की ओर झुकाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस बलों में शीर्ष पदों पर आईपीएस का कोटा तय कर देने से इन बलों के काडर के साथ पुराना अन्याय और बढ़ेगा। इन बलों के काडर ने दस साल की कानूनी लड़ाई के बाद उच्चतम न्यायल के माध्यम से जो अधिकार प्राप्त किया है उस पर अमल का रास्ता इस विधेयक के जरिए बंद किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह इन बलों की व्यवस्था में सुधार नहीं बल्कि इन पर नियंत्रण बढ़ाने का विधेयक है।
द्रमुक के तिरुची शिवा ने कहा कि इन बलों में 13 लाख कर्मचारी और अधिकारी है और प्रोन्नतियों के अवसर सीमित होने, काम की कठिन परिस्थितियों और लाभ तथा सुविधाओं की कमी से इन बलों में निराशा बढ़ी। उन्होंने इसी संदर्भ में केंद्रीय पुलिस बलों में तीन साल में 438 कर्मियों की आत्महत्या, 50 हजार से अधिक इस्तीफो का जिक्र किया।
उन्होंने सवाल किया कि जब उच्चतम न्यायालय ने आईपीएस की प्रकृति नियुक्ति को चरणबद्ध तरीके से दो साल में कम करने का निर्देश दिया है तो उसको बरकार रखने पर सरकार का इतना जोर क्यों है? क्या सरकार इन बलों के काडर के अधिकारियों की योगता पर संदेह करती है?उन्होंने कहा कि विपक्ष ने इसे सदन में प्रस्तुत करते समय भी इसका विरोध किया था1 ' इस विधेयक को लाने का फैसला करना एक पीड़ादायक फैसला है, हमने इसमें कुछ संशोधन सुझाएं हैं, उन्हें इसमें शामिल कर लिया जा तो हम इसका समर्थन करने को तैयार है, अन्यथा इसे प्रवर समिति को भेज दिया जाए।"बीजू जनता दल ने भी विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि हम आईपीए अधिकारियों के विरोधी नहीं है बल्कि हम केंद्र और राज्यों के संबंधों में असंतुलन को लेकर चिंतित है।
राष्ट्रीय जनता दल के संजय यादव ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बालों के अधिकारी भी आयोग से चुन कर आते हैं पर उनके प्रोन्नति के रास्तों को सीमित कर दिया गया है। उन्होंने मांग की कि इन बलों में उच्च पदोंं पर काडर के अधिकारियों को कम से कम 75 प्रतिशत जगह मिलनी चाहिए।
अन्नाद्रमुक से एम थम्बी दुरै ने इस विधेयक का समर्थन करते हुए इसे केंद्रीय पुलिस बलों की व्यवस्था मजबूत करने वाला बताया।
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