लखनऊ/भोपाल , जनवरी 20 -- मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि जनता के विश्वास की रक्षा करना विधायिका का सर्वोच्च दायित्व है। यही विश्वास लोकतंत्र की शक्ति भी है और जिम्मेदारी भी। विधायकों का आचरण सदन के भीतर और बाहर, दोनों ही स्थानों पर लोकतंत्र की साख से जुड़ा होता है। हमें लोकतंत्र को मजबूत करने वाले तत्वों का न केवल पालन करना चाहिए, बल्कि उनका संरक्षण भी करना चाहिए।
श्री तोमर लखनऊ में आयोजित 86वें पीठासीन अधिकारी सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला सहित विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के अध्यक्ष, प्रमुख सचिव, सचिव तथा उत्तरप्रदेश विधानसभा के अधिकारी उपस्थित थे। 'जनता के प्रति विधायिका की जवाबदेही' विषय पर अपने उद्बोधन में श्री तोमर ने विधायिका के दायित्वों, चुनौतियों और उनके समाधान पर विस्तार से विचार रखे।
उन्होंने कहा कि भारत की शासन व्यवस्था में सत्ता का जनता के प्रति उत्तरदायी होना वैदिक काल से ही परंपरा रही है। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम द्वारा स्थापित राम राज्य वस्तुतः जनोन्मुखी शासन प्रणाली का प्रतीक है। सम्राट विक्रमादित्य और सम्राट अशोक जैसे शासकों का शासन भी जनकल्याण का उदाहरण रहा है।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संविधान में निहित है और इसकी जीवनरेखा विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन में है। विधायिका को यह विशिष्ट स्थान प्राप्त है कि वह सीधे जनता के मत से निर्मित होती है। आज सूचना का अधिकार, डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया और जागरूक नागरिक समाज ने विधायिका के समक्ष नई चुनौतियों के साथ नए अवसर भी प्रस्तुत किए हैं। ऐसे में गरिमापूर्ण व्यवहार, मर्यादित भाषा और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान विधायिका की जवाबदेही के अनिवार्य अंग हैं।
मध्यप्रदेश विधानसभा की भूमिका का उल्लेख करते हुए श्री तोमर ने कहा कि प्रदेश की विधानसभा ने लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत किया है। सदन की कार्यवाही को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनोन्मुखी बनाने के लिए अनेक नवाचार किए गए हैं। विधायी समितियों की सक्रियता, प्रश्नकाल की सार्थकता और रचनात्मक चर्चाएं जनता के प्रति जवाबदेही को मजबूत करती हैं।
उन्होंने कहा कि विधायिका की जवाबदेही केवल कानून निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रति संवेदनशीलता भी इसका अभिन्न हिस्सा है। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और अनुसूचित वर्गों के कल्याण जैसे विषयों पर हुई चर्चाएं इस बात का प्रमाण हैं कि विधायिका जनता के वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता देती है।
श्री तोमर ने कहा कि विधायिका का एक महत्वपूर्ण दायित्व कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना भी है। प्रश्न पूछना, नीतियों की समीक्षा करना, सार्वजनिक व्यय पर निगरानी रखना और प्रशासनिक निर्णयों पर चर्चा करना-इन सभी से जनता के हितों की रक्षा होती है। यदि विधायिका सजग, सक्रिय और निष्पक्ष होगी, तो प्रशासन भी अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी बनेगा।
उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन आत्ममंथन का अवसर है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि विधायिका वास्तव में जन-इच्छा की सच्ची प्रतिनिधि बनी रहे। पीठासीन अधिकारियों की निष्पक्ष, संतुलित और संवेदनशील भूमिका ही सदन को सही दिशा देती है और जनता के विश्वास को मजबूत करती है।
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