विद्या शंकर रायलखनऊ , दिसम्बर 30 -- उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन तलाशने में जुटी हुई है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय संगठन को मजबूत करने के लिए पूरे प्रदेश का भ्रमण कर रहे हैं। बीतता हुआ साल कांग्रेस के लिए काफ़ी चुनौतीपूर्ण रहा लेकिन आने वाला चुनावी साल कांग्रेस के लिए काफ़ी अहम साबित होगा। यह देखना होगा कि 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस किस तरह से अपने कार्यकर्तावों में नई जान फूँकती है।

प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि कांग्रेस आगामी पंचायत चुनाव में सहयोगी दल समाजवादी पार्टी (सपा) से अलग होकर अकेले मैदान में उतरेगी। इस फैसले के साथ ही पार्टी ने जिला, ब्लॉक, मंडल, पंचायत और बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने के लिए पांच स्तरों पर पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करने की योजना बनाई है।

वरिष्ठ नेताओं को समन्वयक की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है लेकिन, प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में देरी से कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने का अभियान प्रभावित हो रहा है। उपचुनाव न लड़ने के फैसले ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सामने मौजूद संकट को और गहरा कर दिया।

चुनावी मैदान से दूर रहने के कारण पार्टी मतदाताओं से दोबारा जुड़ने, बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और अपनी चुनावी पहचान बनाए रखने के मौके गंवा बैठी। व्यावहारिक रूप से इसका मतलब रहा-मतपत्रों पर कांग्रेस का चुनाव चिह्न नहीं, स्थानीय स्तर पर कोई अभियान नहीं और लगातार घटती राजनीतिक मौजूदगी। यह स्थिति पार्टी को और हाशिए पर धकेलने वाले दुष्चक्र की तरह सामने आई।

इस पूरे घटनाक्रम ने इंडिया गठबंधन के भीतर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सीमित हैसियत को भी उजागर कर दिया। मजबूत संगठन और व्यापक जनाधार वाली समाजवादी पार्टी के पास कमजोर सहयोगी को ज्यादा राजनीतिक स्पेस देने का कोई खास कारण नहीं था। इस असंतुलन ने कांग्रेस को एक बार फिर जूनियर पार्टनर के रूप में स्थापित किया-ऐसी पार्टी के तौर पर, जो अपनी ताकत से नहीं बल्कि गठबंधनों के सहारे आगे बढ़ने को मजबूर है।

उपचुनाव से दूरी बनाना कांग्रेस के लंबे समय से जारी राजनीतिक पतन की सिर्फ एक और कड़ी है। बीते एक दशक में उत्तर प्रदेश में पार्टी का आधार लगातार सिमटा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में 403 सदस्यीय सदन में कांग्रेस महज दो सीटें ही जीत सकी थी। इससे पहले पार्टी विधान परिषद से पूरी तरह बाहर हो चुकी थी, जो उसके इतिहास में अभूतपूर्व स्थिति मानी गई।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ये चुनावी झटके कांग्रेस की गहरी संरचनात्मक समस्याओं को दर्शाते हैं। कभी जाति और वर्ग के बीच सेतु मानी जाने वाली कांग्रेस आज उस प्रदेश में स्पष्ट राजनीतिक पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, जहां एक ओर भाजपा का हिंदुत्व आधारित राजनीतिक एकीकरण मजबूत है और दूसरी ओर सपा-बसपा की जाति आधारित राजनीति की जड़ें गहरी हैं। भाजपा का अनुशासित संगठन और लगातार जमीनी संपर्क कांग्रेस के बचे-खुचे जनाधार पर भी दबाव बना रहा है।

पार्टी में नेतृत्व की अस्थिरता ने संकट को और बढ़ाया है। बीते वर्षों में चुनावी हार के बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे निर्मल खत्री, अजय कुमार लल्लू और राज बब्बर जैसे नेताओं का पद छोड़ना जवाबदेही तो दिखाता है, लेकिन इससे शीर्ष नेतृत्व में लगातार उथल-पुथल भी सामने आती है। इन बदलावों के बावजूद कांग्रेस राज्य में ऐसा स्थायी नेतृत्व खड़ा नहीं कर पाई, जो कार्यकर्ताओं में भरोसा और ऊर्जा भर सके।

स्थानीय नेताओं का आरोप है कि राष्ट्रीय नेतृत्व और जमीनी हकीकत के बीच दूरी बनी हुई है। वरिष्ठ नेताओं के अनियमित दौरे और फैसलों में देरी के कारण कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और जटिल राज्य में निरंतर संवाद और सक्रियता बेहद जरूरी मानी जाती है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कमजोरी का असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है। लोकसभा की 80 सीटों वाला यह प्रदेश राष्ट्रीय सत्ता की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में यहां प्रभावी ढंग से काम न कर पाने वाली कांग्रेस के लिए खुद को भाजपा के विकल्प के रूप में पेश करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।

संगठनात्मक कमजोरी पार्टी की छवि को भी प्रभावित कर रही है। राज्य समिति का गठन पूरा न कर पाना या उपचुनावों से दूरी बनाना मतदाताओं, सहयोगी दलों और संभावित समर्थकों के बीच असमंजस का संदेश देता है।

2025 के अंत में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के लिए संकेत साफ हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कभी-कभार मिलने वाली सफलता, संगठनात्मक बुनियाद की अनदेखी की भरपाई नहीं कर सकती। संगठन सृजन के तहत हुई जोनल बैठकों से मंशा जरूर दिखी, लेकिन जमीन पर ठोस अमल के बिना गिरावट थमती नजर नहीं आ रही।

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