(कमल किशोर से)औरंगाबाद , फरवरी 05 -- बिहार के औरंगाबाद जिले की मिट्टी में उपजा मगही पान केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि मगध की परंपरा, स्वाद और श्रमशील किसान की पहचान है।

राजाओं-महाराजाओं और नवाबों की शौक़ीन महफिलों से लेकर आम घरों की पूजा-पाठ और त्योहारों तक अपनी जगह बनाए रखने वाला यह पान आज देश की सीमाओं को लांघकर विदेशों तक पहुंच चुका है। बिना किसी सरकारी संरक्षण, उद्योग का दर्जा या संगठित मंडी के, किसानों की पीढ़ियों की मेहनत से खड़ा हुआ मगही पान का यह कारोबार औरंगाबाद को वैश्विक पहचान देने के साथ-साथ हजारों परिवारों की आजीविका का मजबूत आधार बन गया है।

मगही पान का नामकरण बिहार के मगही क्षेत्र के आधार पर हुआ है और इसकी खेती मुख्य रूप से मगध प्रमंडल में ही होती है। मगही पान की खेती बिहार के करीब 27 जिलों में की जाती है। राज्य के औरंगाबाद, गया, नालंदा, मधुबनी, वैशाली, मुंगेर, भागलपुर, अररिया, पूर्णिया और जमुई जिलों में मगही और देशी पान की खेती प्रचलित है। इनमें औरंगाबाद जिला इस व्यवसाय का प्रमुख केंद्र माना जाता है। विशेष रूप से देव, मदनपुर और रफीगंज प्रखंड मगही पान उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहे हैं।

औरंगाबाद जिले के देव प्रखंड के 12 गांव देव, केताकी, खेमचंद बिगहा, भूत्त बिगहा, गिद्धौल, डुमरी, तेजू बिगहा, पचोखर, कीर्ति बिगहा, खड़ीहा, एरौरा और जोधपुर-तथा मदनपुर प्रखंड के बेरी और रफीगंज प्रखंड के लोहरा बड़े पैमाने पर मगही पान के उत्पादन के लिए जाने जाते हैं। हालांकि विभिन्न कारणों से इनमें से कुछ गांवों में हाल के वर्षों में उत्पादन पहले की तुलना में घटा है। इसके बावजूद देव प्रखंड के कई गांवों में आज भी पान की खेती ही लोगों की रोजी-रोटी का प्रमुख साधन बनी हुई है।

केताकी गांव इसका बड़ा उदाहरण है, जहां लगभग 80 परिवार केवल पान के व्यवसाय पर निर्भर हैं। यहां के किसान पीढ़ियों से इस खेती से जुड़े हुए हैं। चौरसिया समुदाय के किसान बताते हैं कि करीब 60 वर्षों से पान की खेती उनके परिवार के पालन-पोषण का आधार रही है। वर्ष 2004 और बाद के कुछ वर्षों में आई भीषण शीतलहर ने पान की खेती को भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे कारोबार पर गहरा असर पड़ा, फिर भी किसानों ने हार नहीं मानी।

किसानों का कहना है कि पहले पान की खेती से प्रति सप्ताह डेढ़ से दो हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती थी। आज भी धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में पान की खेती से लगभग दोगुना लाभ होता है। खेमचंद बिगहा में आठ कट्ठे जमीन में पान की खेती कर रहे वीरेन्द्र चौरसिया के अनुसार यह उनका पुश्तैनी कार्य है और इसी से पूरे परिवार का भरण-पोषण होता है। बेचन चौरसिया बताते हैं कि पान की खेती में परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य मिलकर काम करते हैं, जिससे यह एक सामूहिक पारिवारिक व्यवसाय का रूप ले लेता है।

मगही पान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गुणवत्ता है। विशेष विधि से तैयार पान की पत्ती यदि सीधे जमीन पर गिरा दी जाए तो वह शीशे की तरह टूट जाती है। मुंह में आसानी से घुल जाने वाला यह पान अपने अनोखे स्वाद के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि इसकी मांग केवल देश के विभिन्न हिस्सों में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों में भी है। दवा उद्योग में भी इसकी मांग बताई जाती है।

देव प्रखंड में उत्पादित पान की मंडी वाराणसी में है। यहां से पान की पत्तियां थोक भाव में वाराणसी भेजी जाती हैं और फिर वहां से देश के अन्य हिस्सों तथा विदेशों में मांग के अनुसार आपूर्ति होती है। अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र से जुड़ा कारोबार 10 से 12 करोड़ रुपये का है, जबकि वास्तविक व्यवसाय इससे भी अधिक बताया जाता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि इतने बड़े पैमाने पर कारोबार होने के बावजूद न तो पान की खेती को उद्योग का दर्जा मिला है और न ही सरकारी सहायता, फसल बीमा या विशेष मंडी की व्यवस्था है। किसानों का मानना है कि यदि राज्य सरकार और बैंक अपनी नीतियों में बदलाव करें, आसान किस्तों पर ऋण, फसल बीमा और स्थानीय मंडी की व्यवस्था उपलब्ध कराएं, तो मगही पान का यह अघोषित उद्योग और भी मजबूत हो सकता है।

कुल मिलाकर, औरंगाबाद का मगही पान केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका, क्षेत्र की पहचान और बिहार की समृद्ध कृषि परंपरा का प्रतीक है, जिसने अपनी गुणवत्ता के बल पर विदेशों तक में पहचान बनाई है।

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