तिरुवनंतपुरम , जनवरी 20 -- केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा है कि केरल ने पिछले दस वर्षों में सामाजिक रूप से सबसे उन्नत और संस्थागत रूप से सशक्त भारत के राज्यों में से एक के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत की है।

श्री आर्लेंकर ने मंगलवार को 15वीं केरल विधानसभा के 16वें सत्र की शुरुआत में अपने संबोधन में कहा कि राज्य अपनी विकास यात्रा के अहम मोड़ पर है और केरल ने पिछले दस सालों में सामाजिक रूप से सबसे उन्नत और संस्थागत रूप से सशक्त भारत के राज्यों में से एक के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत की है। उन्हाेंने कहा कि राज्य में अत्यधिक गरीबी को असरदार तरीके से खत्म कर दिया गया है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता और सामाजिक सुरक्षा तक लगभग सभी की पहुंच हो गयी है। उन्होंने बताया कि केरल की शिशु मृत्यु दर अब कई उन्नत अर्थव्यवस्थाओं से कम है, जबकि 80 फीसदी से अधिक बुजुर्ग आबादी पेंशन योजना के तहत कवर है।

राज्यपाल ने प्रशासनिक सुधारों पर जोर देते हुए कहा कि राज्य सरकार ने लगातार 'लोग पहले' दृष्टिकोण को अपनाया है। इसमें चुनाव घोषणापत्र की प्रतिबद्धताओं पर वार्षिक प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक रूप में जारी करना शामिल है। केरल ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लिए लंबे समय से की गयी प्रतिबद्धता को दोहराया। इसमें 28 प्रतिशत योजना निधि स्थानीय स्व-सरकारों के लिए रखी गयी है, जो योजनाबद्ध आर्थिक विकास में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।

उन्होंने कहा कि सभी स्थानीय निकायों को समान रूप से महत्व दिया जाता है। इससे जमीनी लोकतंत्र और संघीय भावना को बल मिलता है। राज्यपाल ने डिजिटल प्रशासन पहल पर भी विस्तार से बात की, जिसने नागरिक सेवाओं की पहुंच बढ़ायी है। इसके साथ ही डिजिटल साक्षरता में सुधार और इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के जरिये डिजिटल विभाजन को पाटने की कोशिशों पर भी जोर दिया। प्रमुख विधायी पहलों का जिक्र करते हुए उन्होंने केरल सार्वजनिक सेवा अधिकार अधिनियम का हवाला दिया, जो अधिसूचित सेवाओं की समयबद्ध आपूर्ति अनिवार्य करता है। राज्य सरकार के अन्य उपायों में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को उनके एकमात्र निवास स्थान पर होने वाली वसूली की कार्यवाही से कानूनी सुरक्षा प्रदान करना और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए मलयालम को राज्य की आधिकारिक भाषा घोषित करने वाला कानून शामिल है।

राज्यपाल ने रोजगार पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के कार्यान्वयन में केरल की नेतृत्वकारी भूमिका पर जोर किया, जबकि हालिया केंद्रीय संशोधनों से 100 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक केंद्रीय सहायता में कमी पर चिंता जतायी। उन्होंने कहा कि राज्य ने केंद्र से योजना की मांग-संचालित प्रकृति को बनाये रखने का आग्रह किया है।

राज्यपाल ने अपने संबोधन में विशेष रूप से स्टार्टअप जैसे नवीन क्षेत्रों में निवेश माहौल में सुधार की ओर इशारा किया, जिसने ठोस परिणाम दिए हैं और केरल के नवोन्मेषी पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है। राज्यपाल ने चेतावनी दी कि केरल तीव्र वित्तीय संकट का सामना कर रहा है जिसका कारण उन्होंने केंद्र सरकार के उन फैसलों को बताया जो वित्तीय संघवाद को कमजोर करते हैं।

उन्होंने कहा कि जनवरी-मार्च 2026 की तिमाही के दौरान, राज्य के पास खर्च की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए लगभग 12,000 करोड़ रुपये होने चाहिए थे, लेकिन इसमें से आधे से अधिक राशि की कटौती कर दी गयी। इसमें 5,944 करोड़ रुपये की धनराशि बिना किसी स्पष्टीकरण के देने से मना कर दी गयी है और सितंबर 2025 तक केरल को मिलने वाली केंद्रीय योजनाओं की बकाया राशि महज 5,650.45 करोड़ रुपये थी।

उन्होंने राजस्व के मोर्चे पर लगने वाले बड़े झटकों की ओर इशारा किया। इसमें जीएसटी दर युक्तीकरण भी शामिल है। इससे सालाना लगभग 8,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। अमेरिका की ओर से लगाये गये पारस्परिक शुल्कों ने भी केरल के निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों को प्रभावित किया है। इस कारण करीब 2,500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके अलावा उधार लेने की सीमा में कटौती और आईजीएसटी समायोजन के कारण राज्य को करीब 17,000 करोड़ रुपये से वंचित कर दिया गया है। इसकेसाथ ही सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) गणना पद्धति में बदलाव से लगभग 4,250 करोड़ रुपये का अनुमानित नुकसान हुआ है।

राज्यपाल ने कहा कि केरल ने राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा लागत का असमान हिस्सा वहन किया है। राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण पर लगभग 6,000 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। उन्होंने ध्यान दिया कि इस व्यय को राज्य की उधार सीमा के खिलाफ समायोजित किया गया। सरकार ने ऐसे खर्चों को अतिरिक्त पूंजीगत व्यय के रूप में व्यवहार करने और उधार सीमा से बाहर रखने की मांग की है।

राज्यपाल ने अत्यधिक केंद्रीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य विधान सभाओं के पारित कई विधेयक अब भी केंद्र सरकार के समक्ष लंबित हैं। केरल ने इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जो वर्तमान में एक संवैधानिक पीठ के सामने हैं।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि दसवें वित्त आयोग की अवधि के दौरान 3.87 प्रतिशत से लेकर पंद्रहवें वित्त आयोग के तहत 1.92 प्रतिशत तक राज्य के मजबूत सामाजिक और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के बावजूद केरल के कर हस्तांतरण हिस्से में तेजी से गिरावट आयी है। उन्होंने जोर दिया कि कर हस्तांतरण और वित्त आयोग का अनुदान राज्य का संवैधानिक अधिकार हैं और दया पर निर्भर नहीं है।

राज्यपाल ने राजकोषीय अपव्यय के आरोपों को खारिज करते हुए दिसंबर 2025 की कैग रिपोर्ट का हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि 2023-24 में खर्च के लिए 56 प्रतिशत से अधिक उधार पूंजी इस्तेमाल की गयी थी। बाजार उधारी वृद्धि में केरल राज्यों में 18वें स्थान पर है, जिसका ऋण-जीएसडीपी अनुपात कोविड के समय के प्रतिशत से घटकर 2024-25 तक लगभग 34 प्रतिशत हो गया है।

वित्तीय बाधाओं के बावजूद राज्यपाल ने कहा कि केरल कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे, औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन में निवेश करना जारी रखेगा। कल्याणकारी लाभों का विस्तार किया गया है, महिलाओं के लिए आय सुनिश्चित योजनाएं शुरू की गयी हैं, युवाओं पर केंद्रित रोजगार पहल शुरू की गयी हैं और कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों के लिए डीए (डीए) और डीआर (डीआर) के बकाये को मंजूरी दी गयी है।

अपने अभिभाषण का समापन करते हुए, राज्यपाल ने कहा कि ये घटनाक्रम वित्तीय संघवाद और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर मौलिक प्रश्न खड़े करते हैं, इसके साथ ही उन्होंने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद और सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों के प्रति केरल की प्रतिबद्धता को दोहराया।

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