गोरखपुर , फरवरी 17 -- जलपुरुष के नाम से विख्यात रैमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा कि सनातन विकास या विकास का सनातन मॉडल ही भारत को दोबारा विश्वगुरु बना सकता है।

डॉ. सिंह मंगलवार को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ;यूपीपीसीबी. और महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय गोरखपुर ;एमजीयूजी. के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित .विकास के साथ पर्यावरणीय चुनौतियां .. साझा प्रयास से सतत विकास..विषयक संगोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए कहा कि विकास के साथ प्रकृति का भी चिंतन भारत का सनातन विचार है। उन्होंने कहा कि इस परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश के लिए सुखद स्थिति है कि यहां के मुख्यमंत्री विकास के सनातन मॉडल को प्राकृतिक और सांस्कृतिक विविधता के एकीकरण को आगे बढ़ा रहे हैं जहां विकास का विचार है तो साथ ही प्रकृति और पर्यावरण को बचाने का प्रतिबद्ध चिंतन भी।

उन्होंने विकास के साथ पर्यावरण की चुनौतियों को समझते हुए इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन के लिए प्रदेश सरकार, खासकर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बधाई दी और पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन से विस्तार से अपनी बात रखी।

विकास और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने वाले विकास के सनातन मॉडल की चर्चा करते हुए उन्होने कहा कि सनातन का मतलब सदैव नित्य नूतन निर्माण। जिसका न आदि हो न अंत हो, वही सनातन है। इस परिप्रेक्ष्य में प्राचीन भारत का विकास सनातन विकास था।

जलपुरुष डॉ राजेंद्र सिंह ने कहा कि संविधान के अस्तित्व में आने से हजारों वर्ष पहले वेदों, उपनिषदों में प्रकृति और पृथ्वी के प्रति मानव के कर्तव्य को समझाया गया है। पंचभूत की परिकल्पना के साथ ही प्रकृति के प्रति संस्कार और व्यवहार को भारत में सदियों पहले ही बता दिया गया था। इसी ज्ञान के कारण दुनिया भारत को विश्वगुरु मानती थी। आज दोबारा विश्वगुरु बनने के लिए भारत को अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा का अनुसरण करना होगा।

जल संकट का विस्तार से उल्लेख करते हुए डॉ सिंह ने कहा कि जल संकट वैश्विक समस्या है लेकिन इसका स्थानीय हल निकाला जा सकता है। इसके लिए जल साक्षरता बढ़ाने की आवश्यकता है। जल संकट से बचने के लिए वाटर डिस्चार्ज और वाटर रिचार्ज में संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि विकास पर एकतरफा ध्यान देने से हमने नदियों से उनकी निर्मलता और अविरलता को छीन लिया। पश्चिम की डैम डिजाइन को भारत की नदियों पर थोप देने से ही आज पारिस्थितिकी बदलने की समस्याएं दिख रही हैं। आज देश के 365 जिले पानी के संकट से जूझ रहे हैं। जल संकट से बचने, पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत विकास की अवधारणा पर काम करने के लिए छोटे छोटे कार्य करने चाहिए। छोटे काम से बड़े काम की कल्पना में जोखिम नहीं है और सफलता शत प्रतिशत हो जाती है। छोटे छोटे प्रयासों से उन्होंने 50 साल में 23 नदियों को पुनर्जीवित किया है। डॉ सिंह ने कहा कि सरिताएं बहती हैं तो सभ्यताएं भी जीवंत रहती हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि प्रकृति व पर्यावरण के दृष्टिकोण से यूपी भगवान का लाडला बेटा है। यहां प्रचुर पानी और मिट्टी बेहतरीन है। यहां भविष्य में कोई जल संकट न हो इसके लिए फसल पद्धति को वर्षा पद्धति से जोड़ने की जरूरत है।

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