नयी दिल्ली , फरवरी 09 -- देश के अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) का अनुपात सितंबर 2025 में घटकर 2.15 प्रतिशत के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया।

वित्त मंत्रालय ने सोमवार को एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि एनपीए में सुधार में साल 2015 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के परिसंपत्ति गुणवत्ता पुनरीक्षण और सरकार की चार 'आर' रणनीति का खासा योगदान रहा है।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि घरेलू कारोबार में सकल ऋण उठाव के मुकाबले सकल एनपीए का अनुपात लगातार आठ वित्त वर्ष से कम हो रहा था और सितंबर 2015 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार यह घटकर 2.15 प्रतिशत के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया जो 2010-11 के स्तर से भी कम है। इसमें सार्वजनिक वाणिज्यिक बैंकों के सकल एनपीए का अनुपात 2.50 प्रतिशत और निजी क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए अनुपात 1.73 प्रतिशत पर रहा। विदेशी बैंकों का एनपीए 0.80 फीसदी था। निजी बैंकों और विदेशी बैंकों की तुलना में सार्वजनिक बैंकों का एनपीए अनुपात अधिक तेजी से कम हुआ है।

एनपीए अनुपात कम होने से बैंकों को अब इस मद में प्रावधान भी कम करना पड़ रहा है। इससे उनका मुनाफा बढ़ रहा है और कारोबार की वृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

एनपीए कम करने के लिए सरकार ने चार 'आर' की रणनीति अपनायी है। इसमें एनपीए वास्तविक स्थिति को स्वीकार करना (रिकग्निशन), उसका समाधान खोजना और अधिकतम ऋण वसूली (रिजॉल्यूशन), पुनर्पूंजीकरण (रिकैपिटलाइजेश) और सुधार (रिफॉर्म) हैं।

सार्वजनिक बैंकों में सुधार के एजेंडे के तहत विस्तृत और स्वतःस्फूर्त अर्ली वार्निंग सिस्टम (ईडब्ल्यूएस) की पहल शुरू की गयी। लगभग 80 ईडब्ल्यूएस जारी हुए जिन पर बैंकों ने कार्रवाई की। शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत मार्च 2025 तक 30 हजार से अधिक आवेदन आये और फंसे हुए ऋण में 13.78 लाख करोड़ रुपये की वसूली संभव हो सकी।

सरफेसी कानून के तहत ऋण वसूली प्राधिकरणों की संख्या बढ़ायी गयी। उनकी सीमा 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये की गयी।

सार्वजनिक बैंकों ने जोखिम में फंसी परिसंपत्ति के प्रबंधन के लिए विशेष वर्टिकल और शाखाएं स्थापित कीं जो उनकी निगरानी करती हैं।

इन उपायों का नतीजा वह हुआ कि निजी बैंकों की तुलना में एनपीए के प्रबंधन में सरकारी बैंकों का प्रदर्शन बेहतर रहा।

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