नयी दिल्ली , जनवरी 07 -- उच्चतम न्यायालय ने लद्दाख के इंजीनियर, पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग करने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर गुरुवार को सुनवाई करेगा।

श्री वांगचुक इस समय राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत में लिए जाने के बाद जोधपुर के केंद्रीय कारागार में बंद हैं। यह याचिका उनकी पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता गीतांजलि जे. आंगमो ने दायर की है।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने मामले में दी गयी दलीलों पर ध्यान दिया और याचिका को गुरुवार को दोपहर दो बजे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने संक्षिप्त सुनवाई के दौरान संकेत दिया कि मामला अगले दिन लिया जाएगा क्योंकि उनके "भाई न्यायमूर्ति मामले को करीब से देखना-समझना चाहते थे।" याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसपर सहमति जताई।

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को सूचित किया कि वे एक आंशिक रूप से सुने गए मामले के कारण शायद उपलब्ध न हों और भारत संघ का प्रतिनिधित्व कोई अन्य वकील करेगा। न्यायमूर्ति कुमार ने इस व्यवस्था की अनुमति देते हुए कहा कि दूसरे मामले को समाप्त किया जा सकता है।

पीठ ने सुनवाई के दौरान एक वीडियो चलाने के श्री सिब्बल के अनुरोध पर भी ध्यान दिया। यह पूछे जाने पर कि क्या विपक्षी पक्ष को पहले से सूचना दी गयी थी, श्री सिब्बल ने पुष्टि की कि प्रतिवादियों को पहले ही सूचित कर दिया गया था। इससे पूर्व, आठ दिसंबर को श्री वांगचुक की ओर से उच्चतम न्यायालय में एक अनुरोध किया गया था जिसमें उन्हें जोधपुर से वर्चुअली पेश होने की अनुमति मांगी गयी थी।

वरिष्ठ वकील सिब्बल ने कहा था कि वांगचुक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़ना चाहते हैं। सॉलिसिटर जनरल ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि ऐसी रियायत से अन्य बंदियों द्वारा भी इसी तरह की मांगें की जाएंगी।

एक नए हलफनामे में, श्रीमती आंगमो ने आरोप लगाया है कि जोधपुर और दिल्ली में इंटेलिजेंस ब्यूरो और राजस्थान पुलिस के अधिकारी उनकी निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का दावा किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उन्हें हवाई अड्डे से जोधपुर जेल तक ले जाने के अलावा पर्दे लगी गाड़ी में यात्रा करवाई। जोधपुर में रहने के दौरान उन्हें आज़ादी से घूमने की अनुमति भी नहीं दी गयी।

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