मुंबई , जनवरी 11 -- मुंबई की एक महानगर मजिस्ट्रेट अदालत ने वर्ष 2023 में गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित रैली से जुड़े कथित गैरकानूनी जमावड़े के मामले में कांग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता ज़ीशान सिद्दीकी को बरी कर दिया।
अदालत ने कहा है कि अभियोजन पक्ष अपराध के आवश्यक तत्वों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
अदालत ने सुश्री वर्षा गायकवाड़ और श्री ज़ीशान सिद्दीकी के साथ-साथ श्री चरनजीत सिंह सप्रा, सुश्री अरमाइटी ईरानी, सुश्री राखी जाधव, श्री संदीप शुक्ला, श्री शौकत शेख और श्री हुसैन दलवई को भी इस मामले में बरी कर दिया। आदेश सुनाते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि कथित घटना स्थल भीड़भाड़ वाला क्षेत्र होने के बावजूद अभियोजन पक्ष ने अपने दावे के समर्थन में एक भी स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन के अनुसार आरोपियों ने महात्मा गांधी जयंती के अवसर पर रैली निकाली थी, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि यह सभा किसी गैरकानूनी उद्देश्य से की गई थी। अदालत ने कहा कि इस तरह की मंशा को साबित करने में विफलता अभियोजन के मामले के लिए निरर्थक सिद्ध हुई।
आज़ाद मैदान पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत के अनुसार, गांधी जयंती के दिन मेट्रो सिनेमा के पास गश्त कर रहे पुलिसकर्मियों ने एक बड़ी भीड़ को रैली में भाग लेते हुए देखा। पुलिस का आरोप था कि रैली अनुमति प्राप्त मार्ग से अलग रास्ते पर जा रही थी, जिसके कारण उसे रोका गया और मामला दर्ज किया गया।
मुकदमे के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज किए, जो सभी पुलिस अधिकारी थे। अदालत ने पाया कि किसी भी गवाह ने कथित रूप से दी गई रैली की अनुमति पत्र को स्वयं नहीं देखा था। अदालत ने यह भी कहा कि हालांकि कोलाबा से मंत्रालय तक रैली की अनुमति होने की बात कही गई थी, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसा कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर पेश नहीं कर सका जिसमें स्वीकृत मार्ग का स्पष्ट उल्लेख हो।
अदालत ने कहा कि चूंकि किसी भी गवाह ने अनुमति पत्र की सत्यता की जांच नहीं की, इसलिए अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि वास्तव में कौन-सा मार्ग अधिकृत था और क्या आरोपी उससे हटे थे। परिणामस्वरूप, रैली के अनधिकृत मार्ग से निकाले जाने का आरोप सिद्ध नहीं हो सका।
मजिस्ट्रेट ने आरोपियों की पहचान को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। एक पुलिस गवाह ने अदालत में मौजूद एक व्यक्ति की पहचान रैली में शामिल आरोपी के रूप में की, लेकिन बाद में यह सामने आया कि उस व्यक्ति का इस मामले से कोई संबंध नहीं था। अदालत ने कहा कि इससे पुलिस गवाही की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने अपने अंतिम अवलोकन में कहा कि आरोपियों के किसी भी गैरकानूनी उद्देश्य को साबित करने का कोई साक्ष्य नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तुत की गई तस्वीरों से न तो आरोपियों की पहचान साबित होती है और न ही कथित घटना स्थल की पुष्टि होती है। इसके अलावा, आम जनता को सड़कों पर गलत तरीके से रोकने (गलत प्रतिबंध) का भी कोई प्रमाण नहीं मिला।
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