नयी दिल्ली , अक्टूबर 27 -- सोते समय आने वाले खर्राटे स्वास्थ्य के लिए घातक साबित होने के साथ ही हृ्दयाघात का खतरा चार गुना बढ़ जाता है। यह दावा वर्ल्ड स्ट्रोक डे (29 अक्टूबर) की पूर्व संध्या पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने किया।

राजधानी के यथार्थ हॉस्पिटल में सोमवार को वर्ल्ड स्ट्रोक डे जागरूकता विषय पर वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रजत चोपड़ा ने बताया कि खर्राटे, नींद में सांस रुकने की समस्या (स्लीप एपनिया) है, जो हृ्दयाघात के जोखिम को दो से चार गुना तक बढ़ा देती है। लेकिन आम तौर पर लोग इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने बताया कि लगभग 50-60 प्रतिशत स्ट्रोक के मरीजों को स्लीप एपनिया होता है।

डॉ. चोपड़ा ने कहा कि आज हृ्दयाघात सिर्फ उम्रदराज लोगों की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि युवाओं में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अगर लोग समय रहते इसकी जांच कराएं और इलाज शुरू करें, तो हृ्दयाघात जैसी गंभीर स्थिति से बचाव संभव है।

डॉ. रजत ने कहा कि पिछले कुछ सालों में महिलाओं में भी हृ्दयाघात के मामलों में वृद्धि देखी गई है। उन्होंने बताया कि आंकड़ों के मुताबिक 2019 में महिलाओं में हृ्दयाघात की दर लगभग 56 प्रतिशत रही। लगभग हर पांच में से एक महिला को अपने जीवनकाल में हृ्दयाघात होता है। 25 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में जीवन काल हृ्दयाघात का जोखिम 25.1 प्रतिशत पाया गया। 25-44 वर्ष की उम्र में महिलाओं में पुरुषों की तुलना में हृ्दयाघात का खतरा अधिक होता है, 45-64 वर्ष की आयु वर्ग में हर पांच में से एक महिला को हृ्दयाघात का खतरा रहता है।

इस अवसर पर वरिष्ठ न्यूरो सर्जन डॉ. सुनील कुमार बरनवाल स्ट्रोक की पहचान के 'एफ़एएसटी' संकेतों को समझें, चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ या पैर में कमजोरी, बोलने में परेशानी जैसे ही ये लक्षण किसी व्यक्ति में अगर दिखे, उसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शुरुआती 4.5 घंटे के भीतर इलाज मिलने पर मरीज की जान बचाई जा सकती है और स्थायी नुकसान से बचाव संभव है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित