शिमला , जनवरी 06 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भारतीय वन अधिनियम की धारा 42 के तहत वन और पुलिस अधिकारियों की बिना वारंट के आरोपी को गिरफ्तार करने की शक्ति को बरकरार रखा है।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि एकल पीठ का पिछला फैसला कानूनी रूप से गलत था, जिसमें इस अपराध को गैर-संज्ञेय माना गया था।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह ने न्यायमूर्ति विवेक ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा की खंडपीठ को इस कानूनी मसले की जिम्मेदारी सौंपी थी कि क्या भारतीय वन अधिनियम की धारा 42 के तहत आने वाले अपराध गैर-संज्ञेय हैं। खंडपीठ ने वन कानून के प्रवर्तन पर इस धारा के गहरे प्रभाव को देखते हुए और अधिनियम के तहत वन पारगमन नियमों के प्रावधानों का विश्लेषण करने के बाद यह व्यवस्था दी कि धारा 42 के तहत अपराध 'संज्ञेय' हैं, जिसका अर्थ है कि संदिग्धों को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा की पीठ ने 2009 के उस पुराने फैसले (राज्य बनाम सत पाल सिंह) को पलट दिया, जिसने ऐसे अपराधों को गैर-संज्ञेय घोषित किया था।
न्यायालय ने पाया कि पिछला फैसला धारा 64 पर विचार करने में विफल रहा था, जो एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह धारा वन और पुलिस अधिकारियों को उन व्यक्तियों को गिरफ्तार करने की शक्ति देती है जिन पर एक महीने या उससे अधिक के कारावास की सजा वाले वन अपराधों का संदेह है। अपने 11 पन्नों के फैसले में अदालत ने कहा कि धारा 42 के तहत किया गया अपराध एक संज्ञेय अपराध है, लेकिन यह जमानती बना रहेगा, जिसमें अधिनियम के अनुसार मुचलके पर रिहाई की अनुमति है।
यह निर्णय हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों के फैसलों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विरोधाभास को स्पष्ट करता है। खंडपीठ ने त्रिपुरा के 1963 के फैसले (अब्दुल अजीज मामला) का समर्थन किया, जो राज्य के कानून को भारतीय वन अधिनियम के तहत दी गई विशेष शक्तियों के अनुरूप बनाता है।
पीठ ने आगे कहा, "यह पाया गया है कि सतपाल सिंह के मामले में दिया गया फैसला सही नहीं है और यह कानून की सही व्याख्या नहीं करता है। इसी सिद्धांत पर आधारित अन्य सभी फैसले भी सही नहीं हैं और उन्हें नजरअंदाज किया जाना चाहिए, जबकि अब्दुल अजीज के मामले में दिया गया फैसला कानून के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुरूप है।"अदालत ने कहा कि नवंबर 2025 में उच्च न्यायालय ने भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 42 के तहत अपराधों की प्रकृति से जुड़ी अस्पष्टता को दूर करने के लिए इस कानूनी प्रश्न को खंडपीठ के पास भेजा था।
इससे पहले न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने 'हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम प्रेम चंद और अन्य' के मामले में सुनवाई के दौरान इस विषय को मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया की खंडपीठ के पास भेजा था।
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