नैनीताल , दिसंबर 10 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जंगलों को आग से बचाने के लिए प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अजय रावत के सुझावों पर अमल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही वन महकमे के सचिव को एक सप्ताह में अदालत में पेश होने के भी निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंदर और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने आज उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (स्टेट लीगल सर्विस अथारिटी) की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।
अदालत के अनुरोध पर पर्यावरणविद् श्री रावत बुधवार को अदालत में पेश हुए। उन्होंने कहा कि वन महकमा जंगलों के मामले में लोगों के साथ ब्रितानी हुकूमत जैसा व्यवहार करता आ रहा है। ग्रामीणों को जंगलों से दूर किया जा रहा है। उनके हकहुकूक छीने जा रहे हैं।
आम लोगों को जंगलों से जोड़े बिना जंगलों को बचाया नहीं जा सकता है। उन्होंने कहा कि वन विभाग को अपने रवैए में बदलाव लाना होगा।
उन्होंने कहा कि जंगलों को बचाने के लिए पहले वन रेंजर और प्रभागीय वनाधिकारी जंगलों में भ्रमण करते थे। इनके ठहरने के लिए प्रदेश में 300 डाक बंगला (विश्राम गृह) बनाये गये हैं। वे आज भी खाली पड़े हुए हैं। वह सैरगाह बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि वनाधिकारियों को जंगलों का रुख करना होगा।
उन्होंने अपने महत्वपूर्ण सुझाव में कहा वन महकमा सिर्फ चार महीने के लिए वन संरक्षक की नियुक्ति करता है और शेष महीने वन संरक्षक नियुक्त नहीं किए जाते हैं। वन संरक्षकों को समय पर वेतन का भुगतान नहीं किया जाता है।
उन्होंने कहा कि 1000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हरी पत्ती वाले वनों की कटाई पर रोक लगाई जानी चाहिए। जंगलों के बीच मौजूद रिसार्ट में अलाव (बोनफायर) जलाने पर रोक लगाई जानी चाहिए।
अंत में अदालत ने न्यायमित्र अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली को निर्देश दिए कि उनके सुझावों को लेकर दो सप्ताह में रिपोर्ट तैयार कर अदालत में सौंपे। साथ ही अदालत ने श्री रावत के सुझावों पर गौर करने के लिए अगले सप्ताह वन सचिव को न्यायालय में पेश होने के निर्देश दिए हैं।
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