एकता नगर , अक्टूबर 31 -- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में गुजरात के एकता नगर में आयोजित समारोह में शुक्रवार को कहा कि कुछ ही दिनों में राष्ट्र राष्ट्रीय गीत, वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाएगा।

श्री मोदी ने कहा कि 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तो वंदे मातरम प्रत्येक भारतीय के प्रतिरोध की सामूहिक आवाज और एकता एवं एकजुटता का प्रतीक बन गया। अंग्रेजों ने वंदे मातरम के उद्घोष पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रयास किया, लेकिन असफल रहे। जो काम अंग्रेज नहीं कर सके, वह पिछली सरकार ने अंततः कर दिखाया। उन्होंने धार्मिक आधार पर वंदे मातरम के एक अंश को हटा दिया, जिससे समाज की विभाजनकारी ताकतों और औपनिवेशिक एजेंडे को बढ़ावा मिला।

प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों की आलोचना करते हुए कहा कि यदि उन्होंने वह गंभीर गलती न की होती तो आज भारत की छवि बहुत अलग होती।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राष्ट्रीय एकता का अर्थ विचारों की विविधता का सम्मान करना भी है, लोकतंत्र में मतभेद स्वीकार्य हैं, लेकिन व्यक्तिगत मतभेद नहीं होने चाहिए। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज़ादी के बाद, जिन लोगों को राष्ट्र का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी, उन्होंने 'हम भारत के लोग' की भावना को कमज़ोर करने का प्रयास किया। भिन्न विचारधाराओं वाले व्यक्तियों और संगठनों को बदनाम किया गया और राजनीतिक अस्पृश्यता को संस्थागत रूप दिया गया। पिछली सरकारों ने सरदार पटेल और उनकी विरासत के साथ उचित व्यवहार नहीं किया और इसी तरह बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर को उनके जीवनकाल में और उनके निधन के बाद भी हाशिए पर रखा।

प्रधानमंत्री ने कहा, " पिछली सरकारों ने डॉ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं के प्रति भी यही रवैया अपनाया था। " इस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए, उन्होंने संगठन पर हुए विभिन्न हमलों और षड्यंत्रों पर भी चर्चा की और कहा कि एक पार्टी और एक परिवार के बाहर हर व्यक्ति और विचार को अलग-थलग करने का जानबूझकर प्रयास किया गया।

श्री माेदी ने कहा कि देश को उस राजनीतिक अस्पृश्यता को समाप्त करने पर गर्व है, जिसने कभी देश को विभाजित किया था, उन्होंने सरदार पटेल के सम्मान में स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी के निर्माण और डॉ अंबेडकर को समर्पित पंचतीर्थ की स्थापना का ज़िक्र किया और कहा कि दिल्ली में बाबा साहेब के निवास और महापरिनिर्वाण स्थल को पिछली सरकारों के शासनकाल में उपेक्षा का सामना करना पड़ा था, लेकिन अब इन्हें एक ऐतिहासिक स्मारक में बदल दिया गया है। पिछली सरकार के कार्यकाल में, केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री के लिए एक समर्पित संग्रहालय था। इसके विपरीत, हमारी सरकार ने सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के योगदान को सम्मान देने के लिए प्रधानमंत्रियों का संग्रहालय बनाया है।

उन्होंने कहा कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किया गया और यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन वर्तमान विपक्षी दल में बिताया, को भी भारत रत्न से सम्मानित किया गया। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जैसे विरोधी विचारधाराओं के नेताओं को भी पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि ये निर्णय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठने और राष्ट्रीय एकता की भावना को मज़बूत करने के इरादे से लिये गये थे। यह समावेशी दृष्टिकोण ऑपरेशन सिंदूर के बाद विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल में भी परिलक्षित हुआ।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय एकता पर हमला करने की मानसिकता औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है। वर्तमान विपक्षी दल को न केवल अंग्रेजों से सत्ता और पार्टी संरचना विरासत में मिली है, बल्कि उन्होंने उनकी अधीनता की मानसिकता को भी आत्मसात कर लिया है।

श्री मोदी ने कहा कि तत्कालीन सत्ताधारियों की मानसिकता के कारण, देश दशकों तक औपनिवेशिक प्रतीकों को ढोता रहा। हमारी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही भारतीय नौसेना के ध्वज से औपनिवेशिक शासन का प्रतीक चिह्न हटाया गया। इस परिवर्तन के अंतर्गत राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बलिदान स्थल अंडमान स्थित सेलुलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मोरारजी देसाई सरकार के कार्यकाल में ही दिया गया था। हाल तक अंडमान के कई द्वीपों के नाम ब्रिटिश हस्तियों के नाम पर थे। अब इनका नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सम्मान में कर दिया गया है और कई द्वीपों का नाम परमवीर चक्र विजेताओं के नाम पर रखा गया है, साथ ही नयी दिल्ली के इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष की प्रतिमा भी स्थापित की गयी है।

उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता के कारण, राष्ट्र के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों को भी उचित सम्मान नहीं दिया गया। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की स्थापना ने उनकी स्मृतियों को अमर कर दिया है। आंतरिक सुरक्षा के लिए 36,000 कर्मियों ने अपने प्राणों की आहुति दी है, जिनमें पुलिस, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ और अन्य अर्धसैनिक बलों के जवान शामिल हैं, जिनके पराक्रम को लंबे समय से उचित सम्मान नहीं दिया गया था।

श्री मोदी ने कहा कि यह उनकी सरकार ही है, जिसने उन शहीदों के सम्मान में पुलिस स्मारक का निर्माण किया। देश अब औपनिवेशिक मानसिकता के हर प्रतीक को हटा रहा है और राष्ट्र के लिए बलिदान देने वालों का सम्मान करके 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को मजबूत कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने एकता को राष्ट्र और समाज के अस्तित्व का आधार बताया और कहा कि जब तक समाज में एकता बनी रहती है, राष्ट्र की अखंडता सुरक्षित रहती है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, राष्ट्रीय एकता को तोड़ने वाली हर साजिश को विफल करना होगा। देश राष्ट्रीय एकता के लिए हर मोर्चे पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है।

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