रीवा , दिसंबर 2 -- मध्यप्रदेश में शासकीय मॉडल साइंस कॉलेज, रीवा के परिसर में जैव-विविधता से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खोज सामने आई है। कॉलेज के नियमित भ्रमण के दौरान डॉ. यश कुमार और डॉ. देवेंद्र शर्मा को भूगर्भशास्त्र विभाग के पीछे स्थित पुराने हॉस्टल परिसर में एक विशिष्ट एवं अनोखे स्वरूप वाला पादप दिखाई दिया। प्रारंभिक परीक्षण के बाद नमूने को वनस्पति विज्ञान विभाग भेजा गया, जहां विशेषज्ञ डॉ. संतोष अग्निहोत्री एवं डॉ. अनूप सिंह बघेल ने इसकी पहचान टेलिलिया कंद के रूप में की। इसका वैज्ञानिक नाम Sauroumatum venosum है और यह एरेसी कुल का अत्यंत दुर्लभ एवं औषधीय महत्व वाला पौधा माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार टेलिलिया कंद के पत्ते सूरन जैसे दिखते हैं, लेकिन अधिक मुलायम, चमकदार और भूमि की ओर झुके होते हैं। इसके कंद में मौजूद तेल ग्रंथियों से लगातार द्रव्य निकलने के कारण आसपास की मिट्टी काली दिखाई देती है। यह प्रजाति प्रायः हिमालय और गिरनार पर्वतीय क्षेत्रों में 900 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर मिलती है। मैदानी क्षेत्र, विशेषकर रीवा जैसे स्थान पर इसका मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण और अध्ययन योग्य माना गया है।
इतिहास एवं परंपराओं में इस पौधे का उल्लेख अत्यंत रोचक रूप में मिलता है। प्राचीन समय में इसका उपयोग पारा और तांबे से सोना बनाने की रसायन विद्या, तांत्रिक साधनाओं और ताबीज निर्माण में किया जाता था। आयुर्वेद में इसे नपुंसकता, शक्ति वृद्धि, अस्थमा, कैंसर तथा वार्धक्य रोकने संबंधी औषधियों में उपयोग किया जाता रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसे गमले में स्थापित कर सिद्ध करने पर सुख-समृद्धि और धन-वृद्धि प्राप्त होने की मान्यता भी है।
इस खोज को कॉलेज की विशिष्ट उपलब्धि बताते हुए प्राचार्य डॉ. रविन्द्रनाथ तिवारी ने वनस्पति विज्ञान विभाग एवं खोजकर्ता शिक्षकों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि न केवल कॉलेज की शैक्षणिक एवं अनुसंधान क्षमता को दर्शाती है, बल्कि छात्रों को औषधीय पौधों एवं जैव-विविधता संरक्षण की दिशा में प्रेरित भी करेगी।
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