रायपुर , जनवरी 24 -- छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड द्वारा 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर मस्जिदों, मदरसों और इमामबाड़ों में ध्वजारोहण एवं कार्यक्रम आयोजन के लिए अनुदान देने के निर्णय ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।
वक्फ बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष सलीम राज ने शनिवार को मीडिया से चर्चा में कहा कि समाज के एक वर्ग पर अक्सर देशभक्ति को लेकर सवाल खड़े किए जाते हैं। ऐसे में बोर्ड का उद्देश्य सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है। उन्होंने बताया कि इसी सोच के तहत यह निर्णय लिया गया है कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर सभी वक्फ संस्थाओं में ध्वजारोहण किया जाए।
श्री सलीम राज के अनुसार कुछ दरगाहों और इमामबाड़ों ने सीमित संसाधनों की वजह से मिठाई वितरण में असमर्थता जताई थी। इसके मद्देनजर वक्फ बोर्ड ने गरीब संस्थाओं को पांच से सात हजार रुपये तक का अनुदान देने का फैसला किया है, ताकि वे ध्वजारोहण के साथ-साथ मिठाई वितरण और राष्ट्रीय पर्वों के महत्व पर संगोष्ठी का आयोजन कर सकें।
कांग्रेस द्वारा इस फैसले पर उठाए गए सवालों पर श्री सलीम राज ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि कांग्रेस ने लंबे समय तक मुसलमानों को केवल वोट बैंक के रूप में देखा और उन्हें मुख्यधारा की राष्ट्रीय सोच से दूर रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा राष्ट्रवाद की बात करती है और जो देश से प्रेम करता है, वह राष्ट्रीय ध्वज का भी सम्मान करता है।
इस बयान पर वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सलाम रिजवी ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस वह पार्टी है जिसने आजादी की लड़ाई लड़ी और जिसके नेताओं ने वर्षों तक जीवन जेल में बिताया। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि कांग्रेस ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया।
श्री रिजवी ने अनुदान प्रस्ताव की व्यवहारिकता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रदेश में हजारों मस्जिदें हैं और यदि सभी को अनुदान दिया जाता है तो इसके लिए भारी राशि की जरूरत होगी, जबकि वक्फ बोर्ड का कुल बजट सीमित है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि राष्ट्रीय पर्वों के लिए अनुदान दिया जा रहा है, तो यह सुविधा केवल मस्जिदों और मदरसों तक ही क्यों सीमित हो, मंदिरों और चर्चों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
वक्फ बोर्ड के इस फैसले ने जहां एक ओर राष्ट्रीय एकता के संदेश को लेकर बहस छेड़ी है, वहीं दूसरी ओर इसके वित्तीय और राजनीतिक पहलुओं को लेकर विवाद और गहरा गया है।
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