रांची , जनवरी 07 -- झारखंड के रांची में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा आज से दो दिवसीय बहुभाषी शिक्षा कॉन्क्लेव की शुरुआत की गयी।

कॉन्क्लेव का उद्घाटन मंत्री उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, सुदिव्य कुमार ने किया। कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र में स्कूली शिक्षा सचिव उमाशंकर सिंह, झारखंड शिक्षा परियोजना निदेशक शशि रंजन, प्राथमिक शिक्षा निदेशक मनोज कुमार रंजन, एलएलएफ के संस्थापक डॉ. धीर झिंगरन, राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. अविनव कुमार, यूनिसेफ की शिक्षा विशेषज्ञ पारुल शर्मा समेत देश के 8 राज्यों से आये शिक्षक, शिक्षाविद, विशेषज्ञ एवं विभिन्न गैर सरकारी सामाजिक संगठनो के प्रतिनिधि शामिल हुए। उद्घाटन सत्र के दौरान मंत्री श्री कुमार ने राज्य में संचालित बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम "पलाश" के शिक्षण अधिगम सामग्रियों के निर्माण में सहयोग करने वाले शिक्षकों और छात्राओं को सम्मानित किया। माननीय मंत्री एवं विशिष्ट अतिथियों ने बहुभाषी शिक्षण से संबंधित प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मंत्री श्री कुमार ने कहा कि बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम बनाने में सहयोग करने वाले शिक्षक और छात्र अन्य लोगो के लिए प्रेरणा बनेंगे। उन्होंने यूनिसेफ और लैंग्वेज लर्निंग फाउंडेशन के सहयोग से संचालित "पलाश" कार्यक्रम की सराहना की। श्री कुमार ने कहा कि झारखंड में पांच जनजातीय भाषाएं है और चार क्षेत्रीय भाषाएं है, भाषायी फूलों को पिरोने के लिए सभी नौ भाषाओ के फूलो को पिरोना आवश्यक है।

श्री कुमार ने कहा कि बच्चो की प्रारंभिक पढ़ाई बोझिल ना होकर रोचक हो। उन्होंने कहा कि मां के ह्रदय की धड़कन ही बच्चों के लिए पहला शब्द होता है। मां ही प्रथम शिक्षिका है, चाहे गर्भ के नौ माह हो या स्कूल जाने से पहले के तीन वर्ष हो। राष्ट्रनिर्माण के लिए शिक्षा को समग्र, सरल और व्यवहारिक बनाने की जरूरत है। राज्य सरकार ने इसी सोच के साथ राज्य की अपनी भाषा नीति बनाने की पहल की है। हम एक ऐसा नागरिक बने, जिसके पास अपनी एक प्रतिभा हो। चार क्षेत्रीय भाषाएं - खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली को भी प्रारंभिक शिक्षा में शामिल करे।

बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम से बच्चो को स्वाभाविक और व्यवहारिक शिक्षा प्रदान की जा रही है, भाषाओ के संरक्षण में पहला प्रयास स्कूली स्तर से हो रहा है, ये अत्यंत सराहनीय है। बच्चो को शिक्षा के साथ जोड़ने के लिए मातृभाषा आधारित शिक्षा आज की जरूरत है। शब्दों की विशिष्टता मातृभाषा आधारित शिक्षा से ही समझ आती है। उन्होंने विभागीय पदाधिकारियों को पांच जनजातीय भाषाओ के साथ शुरू हुए "पलाश" कार्यक्रम में क्षेत्रीय भाषाओ को शामिल करने की नीति बनाने का सुझाव दिया।

स्कूली शिक्षा सचिव उमाशंकर सिंह ने कहा कि बहुभाषी शिक्षा कॉन्क्लेव झारखंड की आत्मा, संस्कृति और पहचान को शिक्षा के माध्यम से सम्मान और पहचान देने का मंच है। भाषायी विविधता सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पूर्वजो की विरासत है। इन भाषाओ को शिक्षा में स्थान देकर विभाग ना केवल शिक्षा को आसान बना रहा है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ो को भी मजबूत बना रहा है।

वर्तमान में राज्य में पांच जनजातीय भाषाओ में पुस्तके और शिक्षण सामग्री राज्य के आठ जिलों के 1041 विद्यालयों में उपलब्ध कराई गयी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी इस बात पर जोर देती है कि कक्षा आठ तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाएं होनी चाहिए। पलाश कार्यक्रम शिक्षा को मातृभाषा से शुरू करने पर बल देती है। दो वर्षो में पलाश कार्यक्रम ने स्कूली बच्चो को शिक्षा से जोड़ने और उनमे शिक्षा के प्रति रूचि बढ़ाने में सफलता पायी है। राज्य सरकार आने वाले वर्षो में बहुभाषी शिक्षा के विस्तार के लिए प्रतिबद्ध है। कॉन्क्लेव के माध्यम से हमें दूसरे राज्यों से भी सीखने का मौका मिलेगा, जिससे हम प्रभावी भाषा नीति बना सके।

राज्य परियोजना निदेशक शशि रंजन ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद राज्य सरकार ने बहुभाषी शिक्षा को संरचित और सुव्यवस्थित तरीके से लागू करने का प्रयास किया है। जो बच्चे मातृभाषा में शिक्षा नहीं प्राप्त कर पाते, वो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाते है। बच्चे घर से जब पहली बार स्कूल पहुँचते है, तो भाषा से कनेक्ट नहीं कर पाते है। प्रारंभिक कक्षाओं के बच्चो को मातृभाषा आधारित शिक्षा देने से उनकी बुनियाद मजबूत होती है।

बहुभाषी शिक्षा से बच्चों में आलोचनात्मक एवं सांस्कृतिक सोच और भाषायी लचीलापन विकसित होता है। हम भले ही कोई भी भाषा सीख ले, मगर मातृभाषा से हमारा जुड़ाव कभी खत्म नहीं होता है, बल्कि यह हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाती है। पांच जिलों से लागू हुए "पलाश" कार्यक्रम का विस्तार करते हुए विभाग ने वर्ष 2024-25 में इसे 8 जिलों तक विस्तारित किया। राज्य परियोजना निदेशक शशि रंजन ने उद्घाटन सत्र में बहुभाषी शिक्षा व्यवस्था के आलोक में राज्य में किये जा रहे पहल का प्रस्तुतीकरण भी किया।

उद्घाटन सत्र में मंत्री श्री कुमार द्वारा पलाश बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम के शिक्षण अधिगम सामग्रियों और चित्रों के निर्माण में सहयोग करने वाले शिक्षकों और छात्राओं को सम्मानित किया गया। जिन शिक्षकों को सम्मान मिला उनमे राजेश सिंकू, सुशिल हांसदा, राजेंद्र लकड़ा, चंद्रवती, धर्मेंद्र उरांव, अनिमा रानी टोप्पो और सिल्वेस्टर सोरेन शामिल है।

सम्मानित होने वाली छात्राओं में कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय, पोटका और कस्तूरबा गाँधी बालिका आवासीय विद्यालय, कांके की सोबिना सोरेन, लक्ष्मी देवी, कोमल कुमारी, अंकिता और रानी खलखो शामिल है। शिक्षकों और छात्राओं को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

पैनल चर्चा में बहुभाषी शिक्षा की संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा की गयी। पैनल चर्चाओं में पारुल शर्मा, प्रो. रामानुजन मेघनाथन, अनुभा राजेश और डॉ. महेंद्र मिश्र सहित राष्ट्रीय स्तर के शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। एलएलएफ के संथापक डॉ. धीर झिंगरन ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में बहुभाषी शिक्षा की आवश्यकता और प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम के दौरान शिक्षकों ने अपने अनुभव सांझा किये।

रमेनी मुंडा, दिलीप कुमार किस्कू एवं दमयंती बिरुआ द्वारा बहुभाषी शिक्षा पद्धति के माध्यम से विद्यालयों में पठन-पाठन के व्यावहारिक अनुभव प्रस्तुत किए गए। वंदना टेटे, डॉ. उषा शर्मा, डॉ. फादर प्रदीप कुजूर और डॉ. खातिर हेम्ब्रम ने बहुभाषी शिक्षा मॉडल एवं स्थानीय संस्कृति का जुड़ाव तथा बहुभाषा सीखने की समानता एवं पहचान निर्माण विषय से संबंधित पैनल चर्चा में भाग लिया।

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