नयी दिल्ली , मार्च 17 -- राज्यसभा में मंगलवार को प्रश्नकाल के दौरान सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने भी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से एक 'सवाल' पूछा जिस पर मंत्री ने कहा कि वह इसे सुझाव के रूप में लेती हैं और देखेंगी कि क्या किया जा सकता है।

दरअसल, सदन में श्रीमती सीतारमण, जिनके पास कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की भी जिम्मेदारी है, कंपनियों की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) से जुड़े पूरक प्रश्नों के उत्तर दे रही थीं। बिहार में कंपनियों के कम खर्च के बारे में पूछे जाने पर वित्त मंत्री ने कहा कि सीएसआर का पैसा कहां खर्च करना है यह कंपनी का निदेशकमंडल तय करता है। इस विषय में सरकार हद से हद अनुरोध मात्र कर सकती है और "वह भी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है"।

इस पर सभापति ने कहा, "क्या आप नियमों में कुछ बदलाव कर सकती हैं? जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को एमएसएमई को ऋण देने के लिए दिशा-निर्देश दिये जाते हैं, उसी तरह क्या सीएसआर के लिए भी कुछ नियम बनाये जा सकते हैं ताकि पिछड़े राज्यों को लाभ मिल सके?"इस पर वित्त मंत्री ने कहा, "आपने सभापति के रूप में यह बात कही है। मैं इसे एक सुझाव के रूप में लेती हूं और देखूंगी कि क्या बेहतर किया जा सकता है।"इससे पहले श्रीमती सीतारमण ने सदन के बताया था कि हर कंपनी को अपने मुनाफे का दो प्रतिशत सामाजिक कार्यों पर खर्च करना होता है। देश के किसी भी हिस्से में कितना खर्च करना है, यह पूरी तरह कंपनी के निदेशकमंडल का निर्णय होता है। इसमें सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

उन्होंने बताया कि कंपनी अधिनियम की धारा 135 में स्पष्ट कहा गया है कि कंपनियां अपने कार्यक्षेत्र के आसपास के क्षेत्रों को प्राथमिकता दें। यदि सीएसआर राशि खर्च नहीं होती तो वित्त वर्ष की समाप्ति के 30 दिन के भीतर उसे एक विशेष बैंक खाते में डालना होता है और अगले तीन साल में खर्च करना होता है। यदि फिर भी खर्च नहीं होता, तो उसे सार्वजनिक कोष में जमा करना होता है।

सीएसआर का पैसा अपना ही ट्रस्ट या एनजीओ बनाकर उसे देने के बारे में श्रीमती सीतारमण ने कहा कि इसमें कानूनी रूप से कुछ भी गलत नहीं है। इस पर सरकार निगरानी रखती है।

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