नयी दिल्ली , जून 27 -- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वैज्ञानिकों से तेजी से बदल रही प्रौद्योगिकी के साथ तारतम्य बनाने का आह्वान करते हुए कहा है कि उन्हें 'सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट' के सिद्धांत यानी जो तेजी से सोचता है, निर्णय लेता है और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करता है वही आगे रहता है पर चलना होगा।

स्वदेशी प्रौद्योगिकी के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्वदेशी प्रणालियां भारत की संचालन तैयारियों को सशक्त बना रही हैं।

श्री सिंह ने गणतंत्र दिवस परेड में विशेष अतिथि के रूप में भाग लेने वाले रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों तथा तकनीकी कर्मियों से मंगलवार को यहां मुलाकात की। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धक्षेत्र में डीआरडीओ की प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग किया गया जिससे यह साबित होता है कि स्वदेशीकरण के मामले में रक्षा क्षेत्र में डीआरडीओ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी-आधारित मौजूदा विश्व में आगे बने रहने के लिए अनुसंधान एवं विकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने वैज्ञानिकों से नवोन्मेषी और त्वरित सोच अपनाने तथा जोखिम लेने से न डरने का आह्वान किया। उन्होंने कहा ," प्रौद्योगिकी बहुत तेजी से बदल रही है और जो प्रौद्योगिकी आज नई है, वह चार-पांच वर्षों में अप्रासंगिक हो सकती है। ऐसे में, विशेषकर युद्धक्षेत्र में, केवल 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' नहीं बल्कि 'सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट' के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा। जो देश तेजी से सोचता है, निर्णय लेता है और तकनीक को तैनात करता है, वही आगे रहता है।"श्री सिंह ने डीआरडीओ से आग्रह किया कि वह उन क्षेत्रों से आगे बढ़े जहां निजी क्षेत्र पहले ही अपनी क्षमताएं विकसित कर चुका है। उन्होंने संगठन के भीतर एक अलग इकाई बनाने का सुझाव दिया जो ऐसे क्षेत्रों में जोखिम उठाए, जहां सफलता की संभावना कम प्रतीत होती है, लेकिन यदि सफलता मिलती है तो वह ऐतिहासिक होगी।

रक्षा मंत्री ने अनुसंधान से प्रोटोटाइप, प्रोटोटाइप से परीक्षण और परीक्षण से तैनाती के बीच समय को कम करने के महत्व का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों में समय पर समावेशन हमारे प्रदर्शन का सबसे बड़ा मानक होना चाहिए। उन्होंने बताया कि डीआरडीओ आमतौर पर डिजाइन और प्रोटोटाइप पर ध्यान देता है, जबकि उत्पादन उद्योगों की भूमिका होती है, लेकिन इस अंतर को पाटना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मॉडलों की तरह सह-विकास की पद्धति अपनाई जा सकती है, जिसमें उद्योग को डिजाइन से लेकर उत्पादन तक शुरुआती चरणों से ही शामिल किया जाए।

डीआरडीओ से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी क्षेत्र के साथ व्यापक सहयोग का आह्वान करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़ने का समय आ गया है। उन्होंने कहा कि हल्का लड़ाकू विमान तेजस, जो आज एक बड़ी उपलब्धि के रूप में उभरा है, डीआरडीओ और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच ज्ञान साझा करने का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि ऐसे कई और लक्ष्य हमारे सामने हैं, लेकिन इसके लिए डीआरडीओ को शिक्षा जगत के साथ सहयोग करना होगा और सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों के साथ ज्ञान साझा करना होगा। उन्होंने कहा कि सरकार का समर्थन तभी सार्थक होगा जब डीआरडीओ एकाधिकार आधारित अनुसंधान मॉडल से आगे बढ़कर सहयोगात्मक पारिस्थितिकी तंत्र अपनाए और सार्वजनिक क्षेत्र, निजी उद्योगों, एमएसएमई, स्टार्ट-अप और अकादमिक संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करे। इस स्थिति में ही हम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़े कदम उठा सकेंगे।

रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार के आत्मनिर्भरता प्रयासों के परिणामस्वरूप रक्षा निर्यात 2014 में 1,000 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 24,000 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इसे और बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। डीआरडीओ को अपने प्रणालियों के डिजाइन चरण से ही निर्यात बाजारों को ध्यान में रखना चाहिए, विशेषकर ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और गोला-बारूद के क्षेत्र में। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि डीआरडीओ वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

श्री सिंह ने वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों को डीआरडीओ की वास्तविक शक्ति बताते हुए कहा कि उन्हें सीखने के अवसर देने के साथ-साथ नेतृत्व की जिम्मेदारियां भी दी जानी चाहिए और यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि उनके विचारों को सुना जाएगा। उन्होंने कहा कि अनुसंधान में असफलताएं होती हैं और हमें उनसे सीखना चाहिए।

इस अवसर पर रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ पुरस्कार योजना 2024 के अंतर्गत पुरस्कार भी प्रदान किए।

डॉ. भगवंतम प्रौद्योगिकी नेतृत्व पुरस्कार 2024 हैदराबाद स्थित एडवांस्ड सिस्टम्स लेबोरेटरी के निदेशक बी.वी. पापाराव को प्रदान किया गया, जिन्होंने अग्नि मिसाइलों और दीर्घ दूरी की हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए भारत की पहली मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल तकनीक से जुड़ी विश्वस्तरीय प्रौद्योगिकियों के डिजाइन, विकास और प्रदर्शन में वैज्ञानिक टीमों का सफल नेतृत्व किया।

डॉ. नागचौधुरी जीवन पर्यंत पुरस्कार 2024 चेन्नई स्थित सीवीआरडीई के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. बालगुरु वी को एमबीटी अर्जुन एमके-1 और भारतीय लाइट टैंक 'जोरावर' जैसे प्रतिष्ठित रक्षा प्लेटफार्मों को साकार करने में उनके असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया गया।

इसके अतिरिक्त तीन सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक उत्कृष्टता पुरस्कार और दो सर्वश्रेष्ठ तकनीकी उत्कृष्टता पुरस्कार भी प्रदान किए गए। इस अवसर पर 'द अनप्रेसिडेंटेड सक्सेस स्टोरी ऑफ द फर्स्ट इंडिजिनस सुपरसोनिक मल्टी-टार्गेट सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम - आकाश' शीर्षक पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसे आकाश परियोजना के पूर्व परियोजना निदेशक और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. जी. चंद्रमौली तथा आकाश के प्रथम परियोजना निदेशक और पद्मश्री डॉ. प्रह्लाद राम राव ने लिखा है।

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