नयी दिल्ली , जनवरी 10 -- रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा है कि भारत रक्षा और औद्योगिक क्षेत्र में अपनी यात्रा के ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय आवश्यकता के रूप में उभरी है। श्री सिंह ने शनिवार को चंडीगढ़ में रक्षा, एयरोस्पेस और रणनीतिक क्षेत्र से संबंधित रक्षा कौशल सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर पिछले एक दशक में भारत के रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में आए परिवर्तनों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना के अंतर्गत यह क्षेत्र आयात निर्भरता से आगे बढ़कर रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों, निजी उद्योग, लघु इकाइयों और स्टार्ट-अप से युक्त एक सशक्त और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र में बदल गया है।
रक्षा सचिव ने कहा कि व्यापार सुगमता के लिए किए गए ठोस प्रयासों और निरंतर नीतिगत सुधारों ने स्वदेशी विनिर्माण को गति दी है, जिससे मानव रहित यान और सेंसर से लेकर तोप, बख्तरबंद वाहन और मिसाइल जैसी जटिल प्रणालियों तक के घरेलू डिजाइन और उत्पादन को प्रोत्साहन मिला है। उन्होंने बताया कि 462 कंपनियों को 788 से अधिक औद्योगिक लाइसेंस जारी किए गए हैं, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 में रक्षा निर्यात 23,162 करोड़ रुपये को पार कर गया, जो 2014 की तुलना में लगभग 35 गुना अधिक है।
श्री सिंह ने हल्के लड़ाकू विमान तेजस, अस्त्र मिसाइल, धनुष तोप और आईएनएस विक्रांत जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्मों को उद्योग, अनुसंधान और कुशल मानव संसाधन के बीच बढ़ते तालमेल के उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने दोहराया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने की अनिवार्यता है। उन्होंने कहा कि बदलती वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं और तेजी से उभरती प्रौद्योगिकियां भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए चुनौतियों के साथ-साथ अभूतपूर्व अवसर भी प्रस्तुत कर रही हैं।
जनशक्ति के महत्व पर जोर देते हुए रक्षा सचिव ने कहा कि वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता केवल हार्डवेयर के स्वदेशीकरण से नहीं, बल्कि कौशल, प्रौद्योगिकी और बौद्धिक पूंजी पर संप्रभुता से भी जुड़ी है। उन्होंने 'स्किल इंडिया मिशन' के तहत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया, जिसमें राष्ट्रीय कौशल विकास निगम और प्रशिक्षण महानिदेशालय जैसे संस्थान रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्रों के लिए वर्तमान क्षमताओं और भविष्य की कौशल आवश्यकताओं की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री के पीएम-सेतु कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए श्री सिंह ने कहा कि यह पहल शिक्षा जगत, उद्योग और रक्षा अनुसंधान एवं विकास के बीच की खाई को पाटने के लिए शुरू की गई है। पांच वर्षों में 60,000 करोड़ रुपये के कुल व्यय के साथ, जिसमें केन्द्र सरकार की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है, पीएम-सेतु कार्यक्रम का उद्देश्य उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना, 'ड्यूल अप्रेंटिसशिप' को बढ़ावा देना, एआई-सक्षम प्रशिक्षण उपकरणों को शामिल करना और अग्निवीरों व पूर्व सैनिकों को संरचित कौशल मार्गों में एकीकृत करना है। उन्होंने राज्य सरकारों और उद्योग भागीदारों से परिणामोन्मुखी दृष्टिकोण के साथ पीएम-सेतु कार्यक्रम को सशक्त बनाने का आह्वान किया, जिसमें 'अप्रेंटिसशिप' और 'ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग' सभी कौशल मार्गों की रीढ़ बने, ताकि उद्योग के लिए तैयार प्रतिभा का निर्माण सुनिश्चित हो सके।
रक्षा सचिव ने रक्षा विनिर्माण में पंजाब की क्षमता को भी रेखांकित किया। उन्होंने राज्य को रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने में सक्षम बनाने के लिए रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र नेटवर्क, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थानों के साथ लघु इकाइयों के मजबूत जुड़ाव तथा समर्पित कौशल और परीक्षण अवसंरचना की आवश्यकता पर बल दिया।
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