राजनीति भाजपा यूजीसीलखनऊ , फ़रवरी 10 -- उत्तर प्रदेश में भाजपा बीते कुछ समय से हिंदू मतदाताओं को धर्म के आधार पर एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के "बंटेंगे तो कटेंगे, एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे" और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "एक रहेंगे तो नेक रहेंगे" जैसे नारों के जरिए पार्टी जातिगत पहचान से ऊपर उठकर हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास कर रही थी।
हालांकि, केंद्र सरकार के अधीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा 2026 में जारी नए नियमों ने इस रणनीति को झटका दिया है और प्रदेश की राजनीति में नई असहजता पैदा कर दी है। यूजीसी के नए नियमों में उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के उद्देश्य से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान किए गए। लेकिन इन नियमों में फर्जी शिकायतों पर दंड का स्पष्ट प्रावधान न होने से सामान्य वर्ग, खासकर अगड़े समाज में नाराजगी देखने को मिली।
उच्चतम न्यायालय ने हालांकि इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तब तक नुकसान हो चुका है। नियमों को लेकर पैदा हुए असंतोष ने एक बार फिर हिंदू समाज के भीतर जातिगत विभाजन को उजागर कर दिया है।
भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनावी मजबूती ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ और भूमिहार जैसे वर्गों पर टिकी रही है। इन्हें पार्टी का कोर वोटर माना जाता है। यूजीसी नियमों के बाद इन्हीं वर्गों में नाराजगी के स्वर तेज हुए हैं। अपने कोर वोट बैंक के भीतर यूजीसी के नए नियम को लेकर नाराजगी बढ़ी है। पार्टी इसको लेकर मंथन कर रही है।"प्रदेश के कई जिलों में भाजपा पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के इस्तीफे सामने आए हैं। कुछ स्थानों पर विरोध के तौर पर पार्टी झंडे उतारने जैसी घटनाएं भी हुईं। राजनीतिक हलकों में इसे भाजपा संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यूजीसी नियमों का असर विश्वविद्यालय परिसरों में भी दिखा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रों और शिक्षकों के बीच टकराव की घटनाएं सामने आई हैं। कैंपस में अगड़े और पिछड़े वर्ग के बीच दूरी बढ़ने के आरोप लग रहे हैं।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं जारी हैं, जिससे माहौल और संवेदनशील हो गया है। 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में यह विवाद भाजपा के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है।
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