नई दिल्ली/चंडीगढ़ , फरवरी 09 -- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोमवार को कहा कि पिछले एक दशक में मोदी सरकार द्वारा किए गए सुधारों के कारण भारत किफायती चिकित्सा और जांच (डायग्नोस्टिक्स) के क्षेत्र में दुनिया का प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
श्री सिंह ने चंडीगढ़ में आयोजित इंडियन थायराइड सोसाइटी (आईटीएसकॉन) के मध्यावधि वार्षिक सम्मेलन में यह बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि थायरॉइड रोगों को केवल एक सामान्य बीमारी नहीं, बल्कि देश के विकास और मानव संसाधन से जुड़ी राष्ट्रीय चिंता के रूप में देखना चाहिए।
श्री सिंह ने बताया कि भारत में लगभग 4 करोड़ लोग थायरॉइड से पीड़ित हैं और करीब 11 प्रतिशत वयस्क आबादी हाइपोथायरायडिज्म से प्रभावित है। उन्होंने कहा कि बड़ी समस्या यह है कि इनमें से कई मामलों का समय पर पता ही नहीं चल पाता। उन्होंने कहा कि यदि गर्भावस्था के दौरान हाइपोथायरायडिज्म की जांच नहीं होने पर नवजात शिशुओं में जन्मजात थायरॉइड की समस्या और दिमागी विकास में स्थायी नुकसान हो सकता है।
श्री सिंह ने कहा कि मधुमेह और मोटापे पर अधिक चर्चा होती है, लेकिन थायरॉइड रोगों के प्रति जागरूकता अभी भी कम है। इसलिए समय पर जांच, जनजागरूकता और विभिन्न चिकित्सा क्षेत्रों के बीच तालमेल बेहद जरूरी है। उन्होंने चिकित्सकों से अपील की कि वे शीघ्र निदान और नवजात स्क्रीनिंग को बढ़ावा दें, क्योंकि डॉक्टर समाज के सच्चे राष्ट्र निर्माता हैं।
श्री सिंह ने बताया कि सरकार अनुसंधान संस्थानों, शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ा रही है ताकि शोध सीधे समाज तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि नवाचार केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका उपयोग आम लोगों के इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं में होना चाहिए।
श्री सिंह ने केंद्रीय बजट में "बायोफार्मा शक्ति मिशन" का जिक्र करते हुये कहा कि इसका उद्देश्य दवाओं और चिकित्सा उपकरणों का स्वदेशी विकास बढ़ाना है। उन्होंने बताया कि भारत ने पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित की है, हीमोफीलिया के लिए जीन थेरेपी परीक्षण किए हैं और कोविड-19 के दौरान डीएनए वैक्सीन भी उपलब्ध कराई है। यह उपलब्धियां भारत की वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाती हैं।
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