गोण्डा , दिसम्बर 15 -- " मैं मरने नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूं " ये कहते हुये गोरों की गुलामी के जंजीरों में जकड़ी भारत मां को आजाद कराने के लिये अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम करने वाले अमर शहीद रण बांकुरे क्रांतिकारी राजेंद्र नाथ लाहिड़ी ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमा और शहादत देकर गुलाम भारतीयों में क्रांति की अलख जगा गये। 17 दिसम्बर 1927 को श्रीलाहिड़ी सूली पर चढ़ने से पहले भोर में व्यायाम कर रहे थे। तभी जेलर ने पूछा " लाहिड़ी आखिर मौत से पहले व्यायाम क्यों कर रहे हो।" लाहिड़ी के उत्तर से जेलर भी सोंच में पड़ गये l लाहिड़ी ने कहा "चूंकि मैं हिन्दू हूं और पुनर्जन्म में मेरी अटूट आस्था है। अतः अगले जन्म में मैं स्वस्थ शरीर के साथ पैदा होना चाहता हूं ताकि अधूरे कार्य को पूरा कर देश को स्वतंत्र करा सकूं।" ब्रिटिश सरकार को चैन से न रहने देने वाले अमर सपूत अशफाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह व राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को काकोरी कांड के आरोप में जैसे ही गोरी हुकूमत के इशारे पर लखनऊ की स्पेशल कोर्ट ने 6 अप्रैल 1927 को फांसी की सजा सुना दी थी। तभी तीनों क्रांतिकारियों को सुनायी गयी सजा की खबर फैलते ही पूरे देश भर में भारतीयों में अंग्रेजों के विरुद्ध खासा आक्रोश बढ़ने लगा और अंग्रेज समझ गये कि इस क्रूर फैसले से देश में चल रहा आंदोलन और भयावह रूप ले लेगा l इससे ठिठकी अंग्रेजी हुकूमत ने मुकर्रर तारीख से दो दिन पहले ही लाहिड़ी को उत्तर-प्रदेश के गोण्डा जेल लाकर फांसी दे दी lभारत माता को आजाद कराने के लिये अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले राजेंद्रनाथ का जन्म बंगाल प्रांत के पबना जिले के मड़यां मोहनपुर गांव में 29 जून 1901 को क्षिति मोहन लाहिड़ी के घर हुआ l उनकी माता का नाम बसंत कुमारी था। लाहिड़ी के जन्म के समय पिता व बड़े भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में सहयोग के आरोप में जेल की सलाखों में कैद थे। हृदय में राष्ट्रप्रेम की भावना संग मात्र नौ साल की आयु में ही लाहिड़ी बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी पहुंचे। वाराणसी में उनकी शिक्षा-दीक्षा संपन्न हुई।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में एमए प्रथम वर्ष के छात्र होते हुये भी अपने जीवन से बेपरवाह लाहिड़ी सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के संपर्क में आ गये और अंग्रेजों के खिलाफ होने वाली क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों में शामिल होने लगे l। राजेंद्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों की पहचान कर शचींद्र नाथ ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस l राजेंद्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी देखकर सानियाल उन्हें अपने साथ लेकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के संपादन का दायित्व देते हुये अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग की कमान सौंप दी। लाहिड़ी भारत मां को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिये योजनाओ का क्रियान्वयन करने के उद्देश्य से हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गये।
पठन-पाठन की अत्यधिक रुचि एवं बांग्ला साहित्य के प्रति अटूट प्रेम की वजह से लाहिड़ी अपने भाईयों के साथ मिलकर अपनी माता बसंत कुमारी नाम के नाम पर एक पारिवारिक पुस्तकालय स्थापित कर लिया था। काकोरी कांड में गिरफ्तारी के समय ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की बांग्ला साहित्य परिषद के मंत्री थे। इनके लेख बांग्ला के बंगवाणी और शंख आदि पत्रों में छपा करते थे। लाहिड़ी ही बनारस के क्रांतिकारियों के हस्तलिखित पत्र अग्रदूत के प्रवर्तक थे। इनका लगातार प्रयास रहता था कि क्रांतिकारी दल का प्रत्येक सदस्य अपने विचारों को लेख के रूप में दर्ज करें।
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