नयी दिल्ली , जनवरी 03 -- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हमेशा स्वदेशी विचारों, स्वदेशी उद्योगों और स्वदेशी क्रियाकलापों पर अपने आप को फोकस किया और भारत आत्मनिर्भरता के जिन लक्ष्यों की तरफ तेजीसे आगे बढ़ रहा है, उसके पीछे इन महापुरुषों की शिक्षाओं का एक विशेष महत्व है।

श्री सिंह ने सर्वश्री वाजपेयी और मालवीय के चित्रों का शनिवार को दिल्ली विधानसभा सदन में अनावरण करने के बाद यहां आयोजित कार्यक्रम में कहा कि दिल्ली विधानसभा का यह परिसर ईंट पत्थरों से बना यह महज कोई ढांचा नहीं है, बल्कि यह वह स्थान है, जहां वर्षों से भारत की लोकतांत्रिक चेतना ने अपने विचारों को स्वर दिया है। यहां से भारत की संसदीय परंपरा को एक नयी दिशा मिली है। इस लोकतांत्रिक केंद्र में खड़े होकर खुद को गौरान्वित महसूस कर रहा हूं, क्योंकि यही वह परिसर है, जहां से विट्ठल भाई पटेल, गोपाल कृष्ण गोखले, मोती लाल नेहरू, लाला लाजपत राय, तेज बहादुर सप्रू, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, मजहरूल हक, सच्चिदानंद सिन्हा और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे महान पुरुषों और इनकी वाणी ने भारत राष्ट्र को एक दिशा दी है।

उन्होंने कहा कि आजादी के पहले इसी विधानसभा में भारतीय संसदीय व्यवस्था की नींव पड़ी थी और इस ऐतिहासिक परिसर में श्री अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय के चित्रों का अनावरण होना हमारी ओर से अपने महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान है। यह केवल दो व्यक्तियों का सम्मान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा, नैतिक राजनीति और राष्ट्रवाद की भावना का भी यह सम्मान है।

उन्होंने कहा कि यह संयोग है कि दोनों महापुरुषों का जन्म एक ही तिथि को है, लेकिन इतिहास में कुछ संयोग ऐसे होते हैं, जो केवल संयोग नहीं रहते हैं बल्कि वे संकेत बन जाते हैं। दोनों महापुरुष अलग-अलग चुनौतियों से जूझे, लेकिन राष्ट्र सेवा, लोकतांत्रिक मूल्यों और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता एक ही स्रोत से प्रवाहित होते हुए देखी जा सकती है। दोनों महापुरुषों ने स्वतंत्रता संग्राम को जीया, महसूस किया और उसे अपने जीवन का आधार बनाया। दोनों ने राष्ट्रीय चेतना को अपने आचरण से एक नयी ऊर्जा दी। दोनों ने हमें सिखाया है कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जन सेवा एक सर्वोच्च मंच है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि श्री वाजपेयी ने जिस गरिमा, संवाद और पारस्परिक सम्मान की राजनीति की वह आज भी अपने में एक बेंच मार्क है। श्री मालवीय ने शिक्षा, संस्कृति और स्वाभिमान को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार बनाया। दोनों ने यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब उसमें विचार हो, संवेदना हो और इसके साथ ही उसमें चरित्र भी हो। उन्होंने कहा कि दोनों ही बहुआयामी व्यक्ति थे। उन्होंने भारत राष्ट्र को एक दिशा देने का काम किया है।उन्होंने कहा कि श्री वायजेयी की कविताओं में राष्ट्र की पीड़ा, आशा दिखती है, वहीं महामना मालवीय के विचारों में शिक्षा को लेकर एक दूरदृष्टि भी दिखायी देती है। दोनों अपने समय में बहुत आगे थे। दोनों ही सच्चे राजनेता थे। ऐसे नेता जो सत्ता से ऊपर राष्ट्र को रखते थे और तात्कलिक लाभ से ऊपर दीर्घकालिक हित को बराबर रखा। उन्होंने कहा कि दोनों महापुरुषों ने हमेशा स्वदेशी विचारों, स्वदेशी उद्योगों और स्वदेशी क्रियाकलापों पर फोकस किया और भारत आत्मनिर्भरता के जिन लक्ष्यों की तरफ तेजी से आगे बढ रहा है, उसके पीछे इन महापुरुषों की शिक्षाओं का एक विशेष महत्व है।

श्री सिंह ने कहा कि जहां एक तरफ श्री मालवीय लोकतंत्र में विचारों की विविधता को राष्ट्र की शक्ति मानते थे, वहीं दूसरी तरफ श्री वाजपेयी ने संसद को टकराव नहीं बल्कि संवाद का मंच बनाते हुए कहा कि सरकारें तो क्षणिक होती है और राष्ट्र तो शाश्वत होता है। उन्होंने कहा कि कोई भी राष्ट्र केवल संसाधनों, तकनीक या आर्थिक सामार्थ्य से महान नहीं बनता है, इस सच्चाई को भी हमें समझना चाहिए। राष्ट्र की असली शक्ति इस बात से तय होती है कि वह किन आदर्शों को अपने जीवन मूल्यों का आधार बनाता है और किन व्यक्तित्वों को अपना आदर्श मानता है, क्योंकि जैसा हमारा आदर्श होता है वैसा ही हमारा चिंतन बनता है। जैसा चिंतन बनता है वैसा ही राष्ट्र का चरित्र गढ़ा जाता है। इसलिए आदर्श सिर्फ स्मरण करने की वस्तु नहीं, वह दिशा देने वाली ऊर्जा होती है। हमें अपने आदर्शों से निरंतर सीखने की आवश्यकता है।

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