प्रयागराज , जनवरी 24 -- प्रयागराज में संगम की रेती पर लगे माघ मेले में बसंत पंचमी से वैष्णव सन्यासियों की धूना पूजा भी शुरू हो गई है। महावीर मार्ग पर लगे श्रीपंच तेरह भाई त्यागी और नर्मदा खण्ड जबलपुर के संतों के शिविरों में बसंत पंचमी से धूना तपस्या शुरू हो गयी है। यह कठिन साधना गंगा दशहरा के पर्व तक इसी तरह चलेगी। यह तपस्या आठ प्रकार की होती है जिसमें सबसे कम उम्र के बालक साधु से लेकर अधिक उम्र तक के साधु धूना तपस्या प्रतिदिन करते है।
स्वामी गोपालदास जी महाराज के मुताबिक त्यागी संत प्रतिदिन अपनी क्षमता के अनुसार धूना तपस्या करता है, जो आठ प्रकार की होती है। स्वामी गोपालदास जी महाराज के मुताबिक त्यागी संतों की आदिकाल से तपस्या करने की परंपरा है। जिसे हम आज भी करते आ रहे हैं। यह तपस्या विश्व शांति, धर्म की रक्षा, सभी की उन्नति, लोककल्याण के लिए की जाती है। माघ मेले में 500 और देशभर में 10,000 त्यागी संत हैं जो धूना तपस्या करते है।
बीकानेर के रामझरोखा कैलाश धाम के युवा राष्ट्रीय संत महामण्डलेश्वर स्वामी सरयू दास महाराज ने भी धूना तपस्या शुरू की है। धूना तपस्या में संत जलते उपलों के बीच बैठकर कठिन तपस्या करते हैं। जैसे-जैसे संत का तप बढ़ता है। वैसे-वैसे उपलों की संख्या भी बढ़ती जाती है। यानी कि शरीर में ताप को सहने की क्षमता संत बढ़ाते रहते हैं क्योंकि जिस समय गर्मी के महीने में लोग कूलर और एसी की ठंडक ढूंढते हैं। उस समय यह वैष्णव संत खुले आसमान में धूप के नीचे आग जलाकर अपने शरीर को तपाते हैं और ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। धूना तपस्या की यह बेहद कठिन साधना गंगा दशहरा तक चलती रहेगी। जो विश्व शांति, विश्व कल्याण और लोगों की उन्नति के लिए किया जाता है।
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