जेनेवा , फरवरी 07 -- महिला जननांग विकृति की भयावह प्रथा को वैश्विक स्तर पर समाप्त करने के प्रयास जारी हैं, फिर भी अब तक 23 करोड़ से अधिक महिलाएं इसका शिकार हो चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है।

तंजानिया के मारा क्षेत्र की 19 वर्षीय ओलिविया अल्बर्ट ने 14 वर्ष की आयु में महिला जननांग विकृति का दंश झेला था। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र यौन और प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी को बताया कि उन्होंने वर्षों तक अपना दर्द इसलिए छिपाया क्योंकि उनके समाज में इसे एक सामान्य परंपरा माना जाता था। ओलिविया का मानना है कि सरवाइवर्स का नेतृत्व उनके समुदाय को बदल रहा है; जब पीड़ित महिलाएं स्वयं अपनी कहानी साझा करती हैं, तो नई पीढ़ी की लड़कियों को इस प्रथा के विरुद्ध खड़े होने का साहस मिलता है।

तंजानिया ही नहीं, बल्कि वर्ष 2026 में ही लगभग 45 लाख लड़कियों पर इस प्रक्रिया से गुजरने का खतरा मंडरा रहा है। अक्सर यह गलत धारणा बनाई जाती है कि इस प्रथा को छोड़ने के प्रयास विदेशी प्रभाव से प्रेरित हैं, लेकिन 'महिला जननांग विकृति के प्रति शून्य सहनशीलता के अंतरराष्ट्रीय दिवस' (6 फरवरी) के अवसर पर स्थानीय समुदाय इस मिथक को चुनौती दी है।

धार्मिक नेता भी अब इस प्रथा की गलत व्याख्याओं के विरुद्ध मुखर हो रहे हैं। गिनी के सम्मानित इमाम उस्मान यबारा कैमारा ने स्पष्ट किया है कि मजहब में ऐसी किसी प्रथा का कोई आदेश नहीं है। उन्होंने शिक्षा के माध्यम से भविष्य की पीढ़ियों को जागरूक करने का सुझाव दिया है। आज 'समग्र यौनिकता शिक्षा' के माध्यम से हजारों स्कूली बच्चों को इस प्रथा के स्वास्थ्य संबंधी खतरों के बारे में शिक्षित किया जा रहा है।

अफ्रीकी देशों में कानूनी और धार्मिक बदलावों की नई लहर दिखाई दे रही है। वर्ष 2025 में जिबूती, इरिट्रिया और सोमालिया के इस्लामी विद्वानों ने एक राष्ट्रीय फतवा जारी कर स्पष्ट किया कि महिला जननांग विकृति करने का कोई धार्मिक आधार नहीं है। कार्यकर्ता नफीसा महमूद मुहूमेद के अनुसार, अब उनके पास संविधान और फतवा जैसी दो शक्तिशाली ढालें हैं, जो परिवारों को यह समझाने में मदद करती हैं कि देश का कानून और धर्म दोनों उनकी बेटियों की रक्षा के पक्ष में हैं।

इथियोपिया में, जहाँ 15 से 49 वर्ष की लगभग 75 फीसदी महिलाएं इस पीड़ा से गुजर चुकी हैं, स्थानीय प्रशासन अब यूएनएफपीए और यूनीसेफ के साथ मिलकर काम कर रहा है। जिला प्रमुख मितिकु गुंटे जैसे लोग, जिन्होंने वर्षों तक प्रसव के दौरान महिलाओं को दम तोड़ते देखा, अब इस लड़ाई में पुरुषों और लड़कों को शामिल कर रहे हैं। विशेष रूप से तैयार किए गए संवादों के माध्यम से बुजुर्गों और युवाओं के बीच घर-घर जाकर जागरूकता फैलाई जा रही है।

चिकित्सा क्षेत्र में भी एक बड़ी चुनौती 'चिकित्सकीय ढंग से महिला जननांग विकृति को करना है। दरअसल स्वास्थ्य कर्मी स्वच्छ उपकरणों की आड़ में इसे सुरक्षित बताने की कोशिश करते हैं। मिस्र की डॉक्टर मरम महमूद का कहना है कि किसी भी परिस्थिति में यह प्रक्रिया न तो सुरक्षित है और न ही इसका कोई चिकित्सकीय औचित्य है। डॉक्टर अब उन परिवारों को मार्गदर्शन देने और इसके दीर्घकालिक मानसिक एवं शारीरिक जोखिमों को समझाने में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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