महासमुंद , मई 10 -- ) छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में जब्त एलपीजी गैस कैप्सूल ट्रकों से करोड़ों रुपये की गैस गायब होने के मामले में पुलिस जांच में बड़ा खुलासा हुआ है।
पुलिस ने रविवार को जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव को पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड बताया है। मामले में अब तक चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि संतोष ठाकुर और सार्थक ठाकुर फरार बताए जा रहे हैं।
पुलिस के अनुसार, दिसंबर 2025 में सिंघोड़ा थाना क्षेत्र में छह एलपीजी गैस से भरे कैप्सूल ट्रक जब्त किए गए थे। भीषण गर्मी और सुरक्षा कारणों को देखते हुए कलेक्टर कार्यालय की ओर से इन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने के निर्देश खाद्य विभाग को दिए गए थे। इसी दौरान गैस गबन की योजना तैयार की गयी।
जांच में सामने आया है कि 23 मार्च 2026 को आरंग स्थित एक ढाबे में बैठक आयोजित हुई, जिसमें जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव, गौरव गैस एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर तथा अन्य लोग शामिल हुए। इसके बाद 26 मार्च को अजय यादव और पंकज चंद्राकर सिंघोड़ा थाना पहुंचे और ट्रकों में भरी गैस का आंकलन किया।
पुलिस के मुताबिक, कैप्सूल ट्रकों में लगभग 102 से 105 मीट्रिक टन एलपीजी गैस भरी हुई थी। उसी रात रायपुर की एजेंसियों से संपर्क किया गया और ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के साथ करीब 80 लाख रुपये में सौदा तय हुआ।
पुलिस ने बताया कि 30 मार्च को खाद्य विभाग के अधिकारी अविनाश दुबे, हरिश सोनेश्वरी और मनीष यादव, ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स संचालक संतोष ठाकुर को साथ लेकर सिंघोड़ा थाना पहुंचे। यहां से छह गैस कैप्सूल ट्रकों को सुपुर्दनामा पर लेकर अभनपुर स्थित प्लांट ले जाया गया।
जांच के अनुसार, इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से गैस निकालने का काम शुरू हुआ। 31 मार्च की रात दो कैप्सूल खाली किए गए, जबकि 1 अप्रैल और 5 अप्रैल की रात अन्य कैप्सूलों से गैस निकाली गई। पुलिस का दावा है कि तीन दिनों के भीतर लगभग 92 टन गैस खाली कर दी गई, जिसे प्लांट के स्थायी बुलेट, निजी टैंकरों और अन्य एजेंसियों में ट्रांसफर किया गया।
मामले में जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कैप्सूल ट्रकों का समय पर वजन नहीं कराया जाना रहा। पुलिस के मुताबिक, सिंघोड़ा से अभनपुर के बीच लगभग 200 किलोमीटर के रास्ते में 15 से अधिक धर्मकांटे मौजूद थे, बावजूद इसके किसी भी स्थान पर ट्रकों की तौल नहीं कराई गई। इसे जानबूझकर किया गया ताकि गैस पहले निकाली जा सके।
पुलिस के अनुसार, छह कैप्सूल ट्रकों को प्लांट से करीब 200 मीटर दूर पार्किंग क्षेत्र में खड़ा किया गया। इनमें से पांच ट्रकों का वजन 6 अप्रैल को तथा अंतिम ट्रक का वजन 8 अप्रैल को कराया गया। तब तक अधिकांश गैस निकाली जा चुकी थी।
दस्तावेजों की जांच में कालाबाजारी के भी बड़े प्रमाण मिले हैं। रिकॉर्ड के अनुसार, अप्रैल माह में ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स ने केवल 47 टन एलपीजी खरीदी थी, जबकि बिक्री 107 टन दर्शाई गई। इस तरह करीब 60 टन गैस की बिक्री ऐसी पाई गई जिसकी कोई वैध खरीदी दर्ज नहीं थी।
जांच में यह भी सामने आया कि रायपुर की कई एजेंसियों और प्लांटों को बिना पक्के बिल के कच्चे चालान के जरिए 4 से 6 टन तक गैस सप्लाई की गई।
महासमुंद पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने पूरे मामले का ठीकरा पुलिस पर फोड़ने की भी योजना बनाई थी। 20 अप्रैल को आरंग के एक ढाबे में हुई बैठक में सभी आरोपियों ने एक समान बयान देने और जांच को भ्रमित करने की रणनीति बनाई।
पुलिस ने बताया कि साक्ष्य मिटाने का प्रयास भी किया गया। प्लांट में वाहनों की एंट्री का रजिस्टर रखा जाता था, लेकिन अप्रैल माह का रिकॉर्ड गायब मिला। इसके अलावा बिना बिल खरीद-बिक्री से संबंधित रजिस्टर भी हटाए जाने की जानकारी सामने आई है।
करीब 15 दिनों तक चली जांच में महासमुंद पुलिस की 40 सदस्यीय टीम ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड, तकनीकी विश्लेषण, दस्तावेजी जांच और वैज्ञानिक पूछताछ के आधार पर पूरे मामले का खुलासा किया। तकनीकी रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि किसी भी गैस कैप्सूल में लीकेज नहीं था और प्राकृतिक रूप से इतनी बड़ी मात्रा में गैस खत्म होना संभव नहीं था।
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