बारां , जनवरी 16 -- राजस्थान के बारां में स्थित 25 करोड़ रुपये की लागत से 32 एकड़ भू भाग में निर्मित 'हाडौती पेनोरमा' इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन रखरखाव एवं सारसंभाल के अभाव में यह अपनी दुर्दशा पर स्वयं आंसू बहाते हुए शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को कोस रहा है।

यद्यपि, राज्य सरकार धरोहर के संरक्षण का दावा करती है, लेकिन यह बारां का हाड़ौती पैनोरमा इस दावे को झुठला रहा है। वर्ष 2018 में उद्घाटित बारांका हाडोती पैनोरमा लंबे अर्से से अपनी उपेक्षा, उदासीनता और दुर्दशा की कहानी बयां कर रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के शासनकाल में निर्मित एवं उनके हाथों से ही 27 अक्टूबर 2018 को उद्घाटित हुआ था। तब से काफी समय से ताले में बंद था। फिर गंदगी, झाड़, झंकार एवं नशेड़ियों एवं अश्लील गतिविधियों का अड्डा बन गया था। मगर किसी का ध्यान नहीं था। जब कोटा, बारां की मीडिया के दल ने इसकी हालत से रूबरू हुए तो उन्होंने इसकी कटु सच्चाई को जग जाहिर किया। इसके बाद आनन-फानन में इसे साफ सुथरा बनाने की कोशिश की गयी।

राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण द्वारा निर्मित इस इमारत में हाडौती के चार जिले कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ के इतिहास पुरुषों की गाथा लिखी गई है। इतना ही नहीं, नींव के इन कंगूरों को मूर्ति कला के माध्यम से दर्शित किया गया है। बनाने वालों के उद्देश्य में कहीं कमी नजर नहीं आती, लेकिन सहेजने वालों की ईमानदारी पूरी तरह नदारद नजर आती है।

राज्य भर में इस तरह के 60 से ज्यादा पेनोरमा बन चुके हैं और इतनों पर ही काम चल रहा है। अब सवाल यह उठता है कि बारां में बने इस पेनोरमा की हालत इस तरह की है तो बाकी का क्या हाल होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

हाल ही प्रशासन ने इस हाड़ौती पैनोरमा की देखभाल के लिये दिसम्बर में चार लाख रुपए का ठेका सत्यनारायण गुर्जर, भवानीशंकर मेहरा की फर्म को दे दिया था, लेकिन ठेकेदार ने भी ध्यान नहीं दिया। इस पैनोरमा में तीन कर्मचारी लगाये गये हैं। मीडिया ने इस मुद्दे को उठाया, तब कहीं जाकर शुक्रवार को सफाई के साथ ही प्रतिमाओं की सुध ली गयी।

यह जगह कहने को एक इमारत हो सकती है, पर इसके अंदर कोटिया भील से लेकर महाराव भीम सिंह द्वितीय, लव कुश की जन्मस्थली सीताबाड़ी, बूंदी की चित्रशाला, कोटा के भगवान मथुराधीश, केशव रायपाटन के भगवान केशवराय, झालावाड़ का गागरोन किला, शाहाबाद की सहरिया आबादी का चित्रण और कोटा के क्रांतिकारियों की गाथा, इसके अलावा भी बहुत कुछ हाडौती के बारे में दर्शाया गया है। सब कुछ तरीके और कायदे से है, लेकिन अब यह इमारत वीरान पड़ी है। इतिहास पुरुषों की मूर्तियों के बस आंसू निकलने ही शेष है।

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