पटना , नवंबर 19 -- बिहार की राजनीति में 'सन ऑफ मल्लाह' के नाम से जातिगत पहचान बना चुके विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के सुप्रीमो मुकेश सहनी जब भी महागठबंधन के पाले में जाते हैं, 'वीआईपी' बनने से चूक जाते हैं।

वीआईपी सुप्रीमो श्री सहनी ने बारी-बारी से दोनों नावों महागठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सवारी की है। वर्ष 2019 , वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव और इस बार के विधानसभा चुनाव में वीआईपी महागठबंधन का हिस्सा रही और तीनों बार शून्य पर सिमट गयी। वहीं वर्ष 2020 के चुनाव में वीआईपी, राजग में शामिल हुयी। इस चुनाव में उसे चार सीटें मिली।चुनाव परिणामों पर नजर डाले तो यह पता चलता है कि महागठंधन का साथ वीआईपी को रास नहीं आता है, हालांकि राजग का साथ मिलने पर वीआईपी कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुई थी ।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी ने दावा किया था कि उनकी पार्टी 60 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि महागठबंधन में सीट बंटवारे के तहत उसे 15 सीटें मिली। सुगौली सीट पर वीआईपी के उम्मीदवार का नामांकन रद्द हो गया, वहीं बाबूबरही सीट पर पार्टी की उम्मीदवार ने नामांकन वापस ले लिया था। इस चुनाव में महागठबंधन के उप मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी के 13 उम्मीदवारों ने चुनावी रणभूमि में ताल ठोका, लेकिन परिणाम सिफर रहा।

देवदास, बजरंगी भाईजान और कलंक जैसी फिल्मों के सेट बना चुके श्री सहनी ने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों की घोषणा से कुछ महीने पहले ही नवंबर 2018 में अपनी अलग पार्टी की घोषणा की थी। राजनीति में वीआईपी तरीके से एंट्री लेने वाले मुकेश ने अपनी पार्टी का नाम विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) रखा। एक समय राजग के ज्यादा नजदीक लग रहे मुकेश सहनी ने 2019 में पाला बदला और महागठबंधन का हिस्सा बन गये। इस चुनाव में वीआईपी के तीन प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे थे, जिनमें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश सहनी शामिल थे। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'चाय पर चर्चा' की तरह ही मुकेश ने 'माछ पर चर्चा' कर सुर्खियां बटोरी थीं। उन दिनों मुकेश सहनी का नारा हुआ करता था 'माछ भात खाएंगे महागठबंधन को जिताएंगे'।महागठबंधन के सीट बंटवारे में उन्हें तीन सीट भी मिलीं, हालांकि किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं हो सकी।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी के महागठबंधन में बने रहने की सारी बातें करीब-करीब तय हो गयी थीं, लेकिन मन मुताबिक सीटें नहीं मिलने के कारण मुकेश सहनी ने महागठबंधन का साथ छोड़ने की घोषणा कर दी।वर्ष 2020 में हुये बिहार विधानसभा चुनाव में श्री सहनी ने 'महागठबंधन' का साथ छोड़ 'राजग' का दामन थाम लिया। उन्होंने तेजस्वी यादव पर पीठ में छूरा भोंकने का आरोप लगाते हुए कम सीटें देने का आरोप लगाया था। वर्ष 2020 में श्री सहनी की पार्टी वीआईपी राजग का हिस्सा थी।इस चुनाव में मुकेश सहनी समेत वीआईपी के 11 प्रत्याशी चुनावी समर में उतरे थे।इस चुनाव में श्री सहनी ने सिमरी बख्तियारपुर सीट पर तत्कालीन सांसद महबूब अली कैसर के पुत्र और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रत्याशी युसूफ सलाहउद्दीन से लोहा लिया था। राजद प्रत्याशी श्री सलाहउद्दीन ने श्री सहनी को पराजित कर दिया था।हैरानी की बात रही कि चुनाव में श्री सहनी सिमरी बख्तियारपुर सीट पर जहां वीआईपी बनने से चूक गये वहीं उनकी पार्टी के चार योद्धाओं ने जीत का परचम लहरा दिया था।

वर्ष 2020 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी राजग की सरकार में मुकेश सहनी पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री बनाए गए थे। मुकेश सहनी को राजग की ओर से विधान परिषद का सदस्य बनाया गया था। वह सरकार में 27 मार्च 2022 तक मंत्री रहे। मुकेश सहनी और राजग का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया। भाजपा और मुकेश सहनी के बीच मनमुटाव बढ़ा तो उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया। इससे पूर्व वीआईपी के तीन विधायक भाजपा में शामिल हो गये और उनकी पार्टी के एक विधायक का निधन हो गया था।

वर्ष 2024 के लोकसभा के चुनाव से पूर्व श्री सहनी फिर से महागठबंधन की शरण ले ली।वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मुकेश सहनी उसी तेजस्वी यादव के सबसे भरोसेमंद साथी के रूप में उभरकर सामने आए, जिसके उपर 2020 में उन्होंने पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगाया था। उन्होंने तेजस्वी के साथ चुनावी सभाओं में राजग पर कड़े प्रहार किये। इस बार के चुनाव में महागठबंधन से वीआईपी को फिर तीन सीटें मिलीं, हालांकि इस बार श्री सहनी ने चुनाव नहीं लड़ा।सभी तीन सीटों पर वीआईपी उम्मीदवारों को शिकस्त मिली।

श्री सहनी पिछले दस सालों से बिहार की सियासत में सक्रिय है। उन्होंने गठबंधन बदलकर सत्ता में जगह पाने की कोशिश की, लेकिन उनको स्थायी राजनीतिक जमीन अभी तक नहीं मिली है। वर्ष 2025 का विधानसभा चुनाव उनके लिए राजनीतिक अस्तित्व और महत्वाकांक्षा की असली परीक्षा थी, लेकिन महागठबंधन में उप मुख्यमत्री पद के उम्मीदवार इस बार भी "वीआईपी" बनने से चूक गये।

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