नयी दिल्ली , जनवरी 27 -- उच्चतम न्यायालय ने उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में 'वीआईपी दर्शन' की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि यह विषय न्यायिक निर्णय के दायरे में नहीं आता है।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने मंदिर में कथित 'वीआईपी' को गर्भगृह में जलाभिषेक की अनुमति और आम श्रद्धालुओं पर पाबंदी को लेकर उच्च न्यायालय में उठाया था।
उच्चतम न्यायालय की अनिच्छा के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और गर्भगृह में प्रवेश के लिए एक समान नीति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 'वीआईपी' दर्जे के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता और यदि कुछ लोगों को कलेक्टर जैसी प्राधिकृत सिफारिशों पर प्रवेश दिया जाता है तो समान स्थिति वाले अन्य भक्तों को भी अधिकार मिलना चाहिए। पीठ ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया।
न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति या प्रतिबंध का निर्णय अदालतों का विषय नहीं है और यह मंदिर प्रशासन के विवेक पर छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की, "यदि अदालतें यह तय करने लगें कि किसे प्रवेश मिले और किसे नहीं, तो यह अदालतों के लिए अत्यधिक होगा।"मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यदि गर्भगृह के भीतर अनुच्छेद 14 को लागू माना गया, तो अन्य मौलिक अधिकारों के दावे भी उठ सकते हैं, जिससे धार्मिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं जटिल हो जाएंगी।
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